काका का चिंतन, रेत का मंथन और विभागों के विलय का महान दर्शन

0

 

इन दिनों काका बड़े गंभीर चिंतन में डूबे हुए हैं। गांव के लोगों का दावा है कि जितना समय पुराने जमाने के ऋषि-मुनियों ने तपस्या में नहीं बिताया होगा, उससे कहीं अधिक समय काका ने रेत व्यवस्था का अध्ययन करने में लगा दिया है। सुबह नदी के घाट पर बैठते हैं, दोपहर वहीं कटती है और शाम तक जब लौटते हैं तो ऐसा लगता है मानो किसी उच्च स्तरीय नीति आयोग की बैठक से वापस आ रहे हों। कई बार तो भूख-प्यास का भी होश नहीं रहता। काका का मानना है कि जहां पानी बहता है, वहीं ज्ञान बहता है, और इन दिनों पानी से ज्यादा रेत की चर्चा बह रही है।

घाट-घाट का पानी पीने, रेत के कण-कण का हिसाब लगाने और महीनों तक मनन करने के बाद काका ने जो निष्कर्ष निकाला है, उसने चौपालों से लेकर चाय की दुकानों तक नई बहस छेड़ दी है। काका का कहना है कि यदि इस बार सरकार किसी कंपनी को रेत खदानों का ठेका दे भी दे, तब भी कहानी इतनी आसानी से समाप्त होने वाली नहीं है। इलाके में चर्चा है कि पुलिस विभाग के कुछ रणनीतिकार किसी न किसी कारण से इस मामले को अदालत तक ले जाने का रास्ता खोज लेंगे। पहले हाईकोर्ट और आवश्यकता पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट तक दस्तक देने में भी देर नहीं लगेगी।

कारणों की सूची भी छोटी नहीं है। कभी पर्यावरण की चिंता सामने आएगी, कभी दुर्घटनाओं का खतरा बताया जाएगा, कभी प्रदूषण का मुद्दा उठेगा और कभी स्थानीय रोजगार की दुहाई दी जाएगी। काका मुस्कुराते हुए कहते हैं कि हमारे यहां कारणों की फसल इतनी अच्छी होती है कि मौसम चाहे कोई भी हो, बहानों की पैदावार कभी कम नहीं होती। उनका अनुमान है कि यदि कोई बड़ी कंपनी मशीनों और संसाधनों के साथ खदानों तक पहुंच भी गई, तो कहीं न कहीं से कोई याचिका निकल आएगी और फिर मामला न्यायालय की चौखट तक पहुंच जाएगा।

काका बताते हैं कि देखते ही देखते लगभग बारह महीने गुजर गए, लेकिन नियमित नीलामी की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। आश्चर्य यह है कि जिले में रेत का कोई बड़ा संकट भी दिखाई नहीं दिया। मकान बनते रहे, दीवारें उठती रहीं, छतें ढलती रहीं और ट्रैक्टरों के पहिए भी लगातार घूमते रहे। कुछ बुजुर्ग तो यहां तक कहते हैं कि पहले ठेकेदारी व्यवस्था के दौरान रेत के भाव ऐसे उछलते थे जैसे बरसात में नदियों का पानी। ऊपर से बाहरी गुर्गों का अलग दबदबा रहता था। अब कम से कम वह दृश्य कम दिखाई देता है।

रोजगार का विषय आते ही काका का चेहरा खिल उठता है। उनका दावा है कि पिछले एक वर्ष में जितने ट्रैक्टर खरीदे गए, जितनी ढुलाई बढ़ी और जितने लोगों को स्थानीय स्तर पर काम मिला, उतना लाभ वर्षों में नहीं मिला था। गांवों में लोगों की आमदनी बढ़ी, कई परिवारों ने अपने पुराने सपने पूरे किए और पलायन की रफ्तार भी कुछ धीमी हुई। काका का तर्क है कि यदि भविष्य में भी किसी कारणवश नीलामी प्रक्रिया अटकती रही, तो रोजगार का यह मॉडल और मजबूत होगा।

लेकिन इस पूरी कथा में यदि किसी विभाग की सबसे अधिक उपेक्षा हुई है, तो वह खनिज विभाग है। काका कहते हैं कि जब रेत के मामले में चर्चा, नियंत्रण, कार्रवाई और प्रभाव का केंद्र पुलिस विभाग ही बन चुका है, तब खनिज विभाग की भूमिका धीरे-धीरे दर्शक दीर्घा तक सीमित होती जा रही है। इसलिए काका अब मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को पत्र लिखने की तैयारी कर रहे हैं। उनका सुझाव है कि कम से कम जिले में खनिज विभाग का विधिवत विलय पुलिस विभाग में कर दिया जाए। आखिर जब जिम्मेदारी भी वही निभा रहा है और चर्चा भी उसी की हो रही है, तो व्यवस्था भी उसी के अनुरूप होनी चाहिए।

काका का मानना है कि यदि ऐसा हो गया तो यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं होगा, बल्कि एक ऐतिहासिक नवाचार कहलाएगा। कौन जाने आने वाले वर्षों में प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थानों में एक नया अध्याय पढ़ाया जाए—”रेत, रोजगार, न्यायालय और पुलिस व्यवस्था का अद्भुत समन्वय”।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed