ऑनलाइन डॉक्टर कौन? नाम प्रतिष्ठित चिकित्सक का, अस्पताल किसी और का डिजिटल दुनिया में डॉक्टर की पहचान का कथित खेल जिस डॉक्टर के नाम पर मरीज पहुंचते हैं, वही नाम दूसरे अस्पताल से जुड़ा मिला कटनी में गंभीर शिकायत
ऑनलाइन डॉक्टर कौन? नाम प्रतिष्ठित चिकित्सक का, अस्पताल किसी और का डिजिटल दुनिया में डॉक्टर की पहचान का कथित खेल
जिस डॉक्टर के नाम पर मरीज पहुंचते हैं, वही नाम दूसरे अस्पताल से जुड़ा मिला कटनी में गंभीर शिकायत

कटनी।। इंटरनेट के दौर में किसी चिकित्सक की पहचान अब केवल उसके क्लीनिक, अस्पताल की नेमप्लेट या विजिटिंग कार्ड तक सीमित नहीं रह गई है। Google, Justdial, Lybrate और सोशल मीडिया जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्ज नाम, फोटो, मोबाइल नंबर, विशेषज्ञता और अस्पताल से जुड़ी जानकारी ही अक्सर मरीज के लिए पहला परिचय बन जाती है। ऐसे में किसी प्रतिष्ठित डॉक्टर की पहचान का कथित तौर पर बिना अनुमति इस्तेमाल किया जाना महज एक डिजिटल गलती नहीं, बल्कि मरीज के निर्णय, चिकित्सकीय पारदर्शिता और डॉक्टर की पेशेवर प्रतिष्ठा से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है।
कटनी में सामने आया डॉ. राकेश रंजन और उनकी पत्नी डॉ. अनीता रंजन की पहचान के कथित दुरुपयोग का मामला इसी वजह से सामान्य शिकायत से कहीं अधिक गंभीर नजर आता है। चिकित्सक दंपति ने पुलिस अधीक्षक को शिकायत देकर आरोप लगाया है कि विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उनके नाम, मोबाइल नंबर, फोटो और पेशेवर पहचान का इस्तेमाल किया जा रहा है तथा डॉ. राकेश रंजन को मां दुर्गा हॉस्पिटल से संबद्ध चिकित्सक के रूप में प्रदर्शित किया गया है।
मरीज के लिए सबसे बड़ा सवाल,वह किस डॉक्टर के पास पहुंच रहा है,इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। मान लीजिए किसी मरीज को किसी विशेष चिकित्सक के अनुभव और प्रतिष्ठा पर भरोसा है। वह इंटरनेट पर डॉक्टर का नाम खोजता है। उसे संबंधित अस्पताल की जानकारी, डॉक्टर की फोटो, मोबाइल नंबर और परामर्श शुल्क दिखाई देता है। मरीज स्वाभाविक रूप से यह मान सकता है कि संबंधित डॉक्टर उसी अस्पताल में उपलब्ध हैं। वह इसी विश्वास के आधार पर अस्पताल पहुंचता है। लेकिन यदि वास्तविकता में संबंधित डॉक्टर उस अस्पताल से जुड़े ही नहीं हैं और मरीज की जांच या उपचार कोई दूसरा चिकित्सक करता है, तो यहां प्रश्न केवल डॉक्टर की छवि का नहीं रह जाता। मरीज को उपलब्ध कराई गई जानकारी सही थी या भ्रामक यह अपने आप में जांच का विषय बन जाता है।
यही कारण है कि इस मामले में पुलिस जांच का केंद्र केवल यह नहीं होना चाहिए कि डॉक्टर का नाम किसने ऑनलाइन डाला, बल्कि यह भी होना चाहिए कि उस जानकारी के आधार पर मरीजों को क्या बताया गया और क्या कोई मरीज उस पहचान के भरोसे वहां पहुंचा।
डिजिटल प्रोफाइल कौन बनाता है और उसकी जिम्मेदारी किसकी
आज अधिकांश मरीज डॉक्टर की जानकारी इंटरनेट पर देखकर अपॉइंटमेंट लेते हैं। ऐसे में किसी डॉक्टर की प्रोफाइल में अस्पताल का नाम जोड़ना, मोबाइल नंबर डालना, परामर्श शुल्क तय करना या मरीजों को संपर्क के लिए प्रेरित करना सामान्य सूचना से कहीं आगे की बात है। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस यह पता लगाए कि संबंधित प्रोफाइल किसने बनाई, उसमें जानकारी किसने उपलब्ध कराई और क्या संबंधित डॉक्टर की अनुमति ली गई थी। इसके साथ ही यह भी देखा जाना जरूरी है कि संबंधित ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर प्रोफाइल किस ईमेल, मोबाइल नंबर अथवा डिजिटल अकाउंट से संचालित की गई।
मामला केवल नाम इस्तेमाल का नहीं, संभावित जवाबदेही का भी
चिकित्सा क्षेत्र में किसी डॉक्टर का नाम केवल एक व्यक्तिगत पहचान नहीं होता। उसके साथ उसकी शैक्षणिक योग्यता, पंजीयन, विशेषज्ञता और वर्षों की पेशेवर विश्वसनीयता जुड़ी होती है। इसलिए किसी दूसरे संस्थान या व्यक्ति द्वारा उस पहचान का उपयोग किए जाने की स्थिति में भविष्य में कोई चिकित्सकीय विवाद उत्पन्न होता है तो जिम्मेदारी तय करना भी जटिल हो सकता है। उदाहरण के लिए यदि किसी ऑनलाइन प्रोफाइल को देखकर कोई मरीज किसी अस्पताल में पहुंचता है और उसे लगता है कि उसका उपचार डॉ. राकेश रंजन द्वारा किया जाएगा, लेकिन वहां कोई अन्य चिकित्सक मरीज को देखता है, तो मरीज और वास्तविक डॉक्टर के बीच एक ऐसी गलत धारणा बन सकती है जिसकी कीमत बाद में गंभीर विवाद के रूप में सामने आ सकती है।
अस्पताल प्रबंधन का पक्ष भी जांच का अहम हिस्सा
इस मामले में मां दुर्गा हॉस्पिटल के डायरेक्टर प्रदीप मलिक ने डॉक्टर के नाम को सोशल मीडिया पर जोड़े जाने की जानकारी से अनभिज्ञता जताते हुए किसी के नाम का अनुचित लाभ नहीं उठाने की बात कही है। यह पक्ष भी जांच के लिए महत्वपूर्ण है। यदि अस्पताल प्रबंधन वास्तव में इन ऑनलाइन प्रोफाइल से अनजान था, तो फिर ये प्रोफाइल किसने बनाई और उनका संचालन कौन कर रहा था यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। दूसरी ओर, यदि अस्पताल की ओर से किसी डिजिटल एजेंसी, मार्केटिंग एजेंसी अथवा किसी कर्मचारी को ऑनलाइन प्रोफाइल प्रबंधन का जिम्मा दिया गया था, तो उस एजेंसी अथवा व्यक्ति की भूमिका की भी जांच आवश्यक होगी।
पुलिस के सामने अब कई महत्वपूर्ण सवाल
इस मामले में जांच के दौरान कुछ बिंदु विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकते हैं पहला, संबंधित ऑनलाइन प्रोफाइल किसने बनाई,
दूसरा, डॉक्टर की फोटो, मोबाइल नंबर और प्रोफेशनल विवरण वहां किस स्रोत से पहुंचा, तीसरा, डॉक्टर को मां दुर्गा हॉस्पिटल से संबद्ध बताने की अनुमति किसने दी, चौथा, ऑनलाइन दर्ज परामर्श शुल्क किसने निर्धारित किया, पांचवां, क्या इन प्रोफाइल के माध्यम से मरीजों से संपर्क अथवा अपॉइंटमेंट लिए गए,छठा, क्या किसी मरीज ने इन ऑनलाइन जानकारियों के आधार पर अस्पताल में उपचार कराया और सबसे महत्वपूर्ण, क्या इस कथित डिजिटल पहचान के इस्तेमाल से किसी व्यक्ति या संस्था को आर्थिक अथवा व्यावसायिक लाभ हुआ।
शिकायत के साथ डिजिटल साक्ष्य भी सौंपे गए
डॉ. रंजन की शिकायत के साथ Google, Lybrate, Justdial और Instagram सहित विभिन्न प्लेटफॉर्म के स्क्रीनशॉट, पहचान संबंधी दस्तावेज तथा चिकित्सकीय पंजीयन प्रमाण-पत्र की प्रतियां उपलब्ध कराए जाने की बात कही गई है। इसलिए अब मामला डिजिटल रिकॉर्ड के सत्यापन का भी है। पुलिस के लिए यह पता लगाना अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित सामग्री कब अपलोड हुई, किस अकाउंट से हुई और बाद में उसमें कोई बदलाव किया गया या नहीं।
डॉक्टर की प्रतिष्ठा और मरीज का अधिकार दोनों की सुरक्षा जरूरी
इस मामले को किसी व्यक्ति या अस्पताल के पक्ष-विपक्ष में देखने के बजाय मरीज के अधिकार और चिकित्सा व्यवस्था में पारदर्शिता के नजरिए से देखना अधिक उचित होगा। यदि डॉक्टर के आरोप सही हैं तो उनकी 26 वर्षों की पेशेवर पहचान के कथित दुरुपयोग की जवाबदेही तय होना जरूरी है। वहीं यदि अस्पताल प्रबंधन का पक्ष सही है और उसने वास्तव में ऐसी कोई प्रोफाइल नहीं बनाई, तो उसे भी इस डिजिटल पहचान के दुरुपयोग की वास्तविक जिम्मेदारी सामने लाने में सहयोग मिलना चाहिए।
अंततः इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति डॉक्टर या अस्पताल नहीं, बल्कि वह मरीज है जो इंटरनेट पर दिखाई गई जानकारी पर विश्वास करके इलाज कराने पहुंचता है। इसीलिए पुलिस जांच का परिणाम यह स्पष्ट करने वाला होना चाहिए कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दिखाई गई चिकित्सकीय पहचान वास्तविक थी या नहीं, मरीजों को किस आधार पर जानकारी दी गई और इस कथित पहचान के पीछे वास्तव में कौन था। फिलहाल पुलिस अधीक्षक कार्यालय में शिकायत दर्ज हो चुकी है और जांच के बाद वैधानिक कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है। इसलिए आरोपों की अंतिम सत्यता जांच के निष्कर्ष के बाद ही स्पष्ट होगी। लेकिन यह प्रकरण कटनी में स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी ऑनलाइन जानकारी की विश्वसनीयता और डिजिटल प्रोफेशनल पहचान की सुरक्षा पर एक गंभीर सवाल जरूर खड़ा करता है।