छात्रावासों में अधीक्षकों का वर्षों से कब्जा या विभागीय संरक्षण? परेशान बच्चियों को कई किलोमीटर चलकर पहुंचना पड़ा कलेक्टर के पास, सोनू सिंह और प्राचार्य को निलंबित करने की मांग

जयसिंहनगर। आदिवासी छात्रावासों की व्यवस्थाओं, अधीक्षकों की कार्यप्रणाली और जनजातीय कार्य विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जयसिंहनगर क्षेत्र के छात्रावास से जुड़ी समस्याओं को लेकर छात्राएं कई किलोमीटर का सफर तय कर शहडोल कलेक्टर कार्यालय पहुंचीं और कलेक्टर से मुलाकात कर अपनी परेशानी बताई। इस दौरान बच्चियों ने छात्रावास अधीक्षक सोनू सिंह और प्राचार्य दोनों को निलंबित करने की मांग रखी।
छात्राओं की शिकायतों का केंद्र छात्रावास में पदस्थ जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली और उनके व्यवहार को लेकर नाराजगी रही। हालांकि मुलाकात के दौरान छात्राओं ने अन्य समस्याओं को लेकर विस्तार से कोई बड़ी शिकायत सामने नहीं रखी, लेकिन अधीक्षक और प्राचार्य के खिलाफ निलंबन की मांग ने छात्रावास की आंतरिक व्यवस्थाओं को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
कलेक्टर ने दिया जांच और कार्रवाई का भरोसा
छात्राओं की बात सुनने के बाद कलेक्टर ने पूरे मामले की जांच कराने का आश्वासन दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच में यदि कोई गलत पाया जाता है तो संबंधित के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। मुलाकात के बाद छात्राओं को शासकीय वाहन से वापस भेजा गया। अब सवाल यह है कि जांच केवल कागजों और संबंधित अधिकारियों के जवाब तक सीमित रहेगी या फिर छात्रावास पहुंचकर वास्तविक परिस्थितियों का भी जायजा लिया जाएगा।
सहायक आयुक्त कार्यालय की कार्यप्रणाली पर भी सवाल
इस पूरे मामले में जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त कार्यालय की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। जिले के कई छात्रावासों में अधीक्षकों और कर्मचारियों के लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थ रहने की शिकायतें पहले भी उठती रही हैं। आखिर ऐसी क्या वजह है कि वर्षों से एक ही स्थान पर जमे कर्मचारियों की पदस्थापना की समीक्षा और स्थानांतरण की प्रक्रिया प्रभावी ढंग से नहीं हो पा रही है? क्या विभाग के पास लंबे समय से पदस्थ कर्मचारियों की अद्यतन जानकारी और उनके कामकाज की नियमित समीक्षा की व्यवस्था है?
रामनारायण पाण्डेय ने पहले ही सौंपा था शिकायत पत्र
उल्लेखनीय है कि भाजपा जयसिंहनगर के पूर्व मंडल अध्यक्ष रामनारायण पाण्डेय ने 7 सितंबर 2026 को सहायक आयुक्त, जनजातीय कार्य विभाग शहडोल को लिखित आवेदन सौंपकर जिले के आदिवासी छात्रावासों में 10 वर्ष या उससे अधिक समय से पदस्थ अधीक्षकों एवं कर्मचारियों की सूची तैयार कर नियमानुसार स्थानांतरण करने की मांग की थी। उन्होंने भोजन व्यवस्था, विद्यार्थियों की उपस्थिति, उपलब्ध सामग्री, सुविधाओं और वित्तीय प्रबंधन की स्वतंत्र एवं उच्चस्तरीय जांच कराने तथा अनियमितता मिलने पर जिम्मेदारों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग भी की थी।
अब बच्चियों का कलेक्टर कार्यालय पहुंचना और अधीक्षक एवं प्राचार्य के निलंबन की मांग करना विभागीय व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर गंभीरता से विचार करने का अवसर है। कलेक्टर को जिले के आदिवासी विकास विभाग के अंतर्गत संचालित सभी छात्रावासों में आमूलचूल परिवर्तन की दिशा में पहल करनी होगी। केवल शिकायतों पर औपचारिक जांच के बजाय छात्रावासों का औचक निरीक्षण, विद्यार्थियों से अलग-अलग बातचीत, भोजन की गुणवत्ता, उपस्थिति, बजट और खरीदी का भौतिक सत्यापन आवश्यक है। जांच की कमान ऐसी टीम को दी जानी चाहिए जो स्थानीय विभागीय दबाव से मुक्त होकर वास्तविक स्थिति सामने ला सके।
आदिवासी बच्चों के भविष्य और उनके अधिकारों से जुड़े इन छात्रावासों में जवाबदेही तय होना जरूरी है। अब देखना होगा कि प्रशासन की जांच व्यवस्था में बदलाव लाती है या यह मामला भी आश्वासन और कागजी कार्रवाई तक सिमटकर रह जाता है।