राष्ट्रपति के ‘दत्तक पुत्रों’ पर भ्रष्टाचार का प्रहार; कागज़ों में स्वीकृत आशियाना, हकीकत में सिर्फ खुदे हुए गड्ढे! प्रधानमंत्री आवास योजना में बड़ा भ्रष्टाचार
गौरेला पेंड्रा मरवाही
“यह कहानी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि प्रशासनिक क्रूरता और इंसानियत के तार-तार होने का वो कड़वा सच है, जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की रूह कांप जाए। हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ के जिला गौरेला-पेंड्रा-मरवाही के जनपद पंचायत गौरेला के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत चुकतीपानी की।
यहाँ के सुदूर, दुर्गम वनांचल क्षेत्रों में रहने वाली विशेष पिछड़ी बैगा जनजाति—जिन्हें देश के राष्ट्रपति का ‘दत्तक पुत्र’ होने का गौरव प्राप्त है—आज सरकारी तंत्र की अमानवीय उदासीनता और भ्रष्ट ठेकेदारों की लालच की आग में झुलस रही हैं। केंद्र सरकार ने इन सीधे-साधे आदिवासियों के सम्मानजनक जीवन के लिए ‘प्रधानमंत्री जनमन योजना’ जैसी अत्यंत संवेदनशील योजना की शुरुआत की थी। लेकिन धरातल पर सच यह है कि इन बेबस आदिवासियों के भोलेपन का फायदा उठाकर योजना को भ्रष्टाचार की दीमक चाट रही है।”
चुकतीपानी से दिल को झकझोर देने वाली ग्राउंड रिपोर्ट
इस बेबसी और लाचारी को समझने के लिए इन दो परिवारों की सिसकियों को सुनना और देखना बेहद ज़रूरी है:
खोदे गए गड्ढे और अधूरी उम्मीदें: वीडियो में एक बेबस बुजुर्ग अपनी लाचारी बयां कर रहे हैं। ग्राम पंचायत चुकतीपानी के रहने वाले इस बुजुर्ग ने बताया कि उनके बेटे बीरसिंह के नाम पर करीब 1 साल पहले एक पक्के आशियाने का सपना स्वीकृत हुआ था। लेकिन एक बेरहम ठेकेदार ने इनके सीधेपन का फायदा उठाया, आवास निर्माण के नाम पर 40,000 की राशि निकाल ली और इन्हें बेसहारा छोड़कर गायब हो गया। आज इनके हिस्से में मकान की जगह सिर्फ घर के पीछे खुदे हुए वो गड्ढे हैं, जो हर दिन सरकारी सिस्टम के खोखले दावों को मुंह चिढ़ाते हैं। बुजुर्ग का दर्द साफ़ झलकता है कि बरसात के दिनों में टूटी झोपड़ी में जहरीले सांप-बिच्छुओं का साया रहता है, पर इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
4 पीढ़ियों की बेबसी और मासूमों के आंसू: वीडियो में कार्तिक राम अपनी पत्नी और अपने छोटे-छोटे मासूम बच्चों को समेटे हुए एक जर्जर, लकड़ियों और बांस की बदहाल कुटिया के सामने खड़े हैं। कार्तिक रूंधे गले से बताते हैं कि उनकी 4 पीढ़ियाँ इसी बदहाली में गुज़र गईं। 2 साल पहले जनमन योजना के तहत आवास स्वीकृत हुआ, लेकिन ₹40,000 की पहली क़िस्त डकारने के बाद काम शुरू ही नहीं किया गया। इस आधुनिक दौर में भी इस परिवार की महिलाएं मीलों दूर से सिर और कांवर पर पानी ढोकर लाने को मजबूर हैं। बरसात के आते ही यह पूरी कुटिया पानी-पानी हो जाती है, जहाँ सिर छुपाने तक की जगह नहीं बचती।
तीखे और संवेदनशील सवाल
”क्या लिखा-पढ़ी न जान पाना और सीधा होना ही इन आदिवासियों का सबसे बड़ा गुनाह है? जो बैगा समाज अपनी आजीविका के लिए सिर्फ प्रकृति पर निर्भर है, उनकी अज्ञानता का फायदा उठाकर उनके हक के पैसों की बंदरबांट करने की हिम्मत इन ठेकेदारों में कहाँ से आती है? जब ये मासूम बच्चे बरसात की रातों में टपकती कुटिया के नीचे डरकर सिसकते होंगे, तब क्या वातानुकूलित कमरों में बैठे ज़िम्मेदार अफसरों को नींद आती होगी?”
प्रशासनिक जवाबदेही
इस पूरे संवेदनशील मामले में सबसे बड़ा सवाल जनपद पंचायत गौरेला के प्रशासनिक अमले पर उठता है। जनपद पंचायत गौरेला के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) और संबंधित जिला स्तरीय अधिकारियों की यह बुनियादी और नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वे बिना भौतिक सत्यापन के, बिना ज़मीन पर एक भी ईंट रखे, लाभार्थियों के खाते से ₹40,000 की राशि कैसे आहरित होने दे रहे हैं? अधिकारियों की यह लापरवाही सीधे तौर पर इन आदिवासियों के जीने के अधिकार पर कुठाराघात है।
जनहित की हुंकार
”मूसलाधार बारिश का मौसम सिर पर है। ऐसे में ये मासूम बच्चे, असहाय महिलाएं और बुजुर्ग इस टूटी झोपड़ी में, सांप-बिच्छुओं के साये के बीच अपनी जिंदगी कैसे गुजारेंगे? क्या जिला प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी या हादसे का इंतज़ार कर रहा है?
एक सजग और जनहित के प्रति समर्पित पत्रकार होने के नाते, हमारा यह वैधानिक और नैतिक दायित्व है कि हम इस अमानवीय शोषण के खिलाफ अपनी आवाज़ को और उग्र करें। हम जिला प्रशासन और कलेक्टर से यह मांग करते हैं कि इस पूरे मामले की तत्काल उच्च स्तरीय जांच कराई जाए, दोषी ठेकेदारों पर कार्रवाई हो और ग्राम पंचायत चुकतीपानी के इन पीड़ित बैगा परिवारों को तुरंत प्रभाव से उनका पक्का मकान और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई जाएं। जब तक इन आदिवासियों को उनका हक नहीं मिलता, हमारी पैनी नज़र इस खबर पर बनी रहेगी और हम इनके न्याय की लड़ाई लड़ते रहेंगे।”