जन्म से गूंगी-बहरी आदिवासी बेटी आज भी अपने अधिकारों से वंचित, दिव्यांग प्रमाण पत्र एवं पेंशन के लिए दर दर भटकता परिवार
मरवाही /घिनौची, ग्राम पंचायत मालाडांड, जनपद पंचायत मरवाही (जिला गौरेला-पेंड्रा-मरवाही)
शासन-प्रशासन भले ही अंतिम व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं के लाभ पहुंचाने के बड़े-बड़े दावे कर रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी वनांचल और आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी उदासीनता की पोल खोलती है। मरवाही जनपद के मालाडांड पंचायत अंतर्गत ग्राम घिनौची से एक अत्यंत संवेदनशील मामला सामने आया है, जहाँ 23 वर्षीय नीरा बाई पोट्टाम जो जन्म से ही मूक-बधिर (गूंगी एवं बहरी) हैं, आज तक अपने बुनियादी अधिकारों और विकलांगता प्रमाण पत्र से वंचित हैं।
सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद भी न्याय नहीं
पीड़िता के परिजनों (माता शंकरवती और भाई डोमन सिंह ) ने बताया कि वे नीरा बाई का विकलांगता प्रमाण पत्र बनवाने के लिए जिला अस्पताल, चंगेरी में आयोजित कलेक्टर शिविर और प्रशासनिक दफ्तरों के कई बार चक्कर काट चुके हैं। हर बार सिर्फ आवेदनों की पावती ही मिलती रही, लेकिन आज तक न तो दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी हुआ और न ही कोई सहायता मिली।
मूलभूत योजनाओं से पूरी तरह वंचित
एक तरफ जहां देश में हर जरूरतमंद को राशन और सामाजिक सुरक्षा पेंशन देने की बातें की जाती हैं, वहीं इस गरीब आदिवासी परिवार को नीरा बाई के नाम से
दिव्यांगता प्रमाण पत्र नहीं मिला है।
विकलांगता पेंशन / सामाजिक सुरक्षा पेंशन का लाभ नहीं मिल रहा है।
राशन कार्ड में नाम / खाद्यान्न सुविधा का समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
लाचारी का आलम यह है कि परिवार सरकारी चौखट पर जाकर अपनी फरियाद सुना-सुनाकर थक चुका है, किंतु जिम्मेदार अधिकारी नींद से जागने का नाम नहीं ले रहे हैं।
प्रशासनिक संज्ञान और मुख्य माँगें:
यह मामला सीधे तौर पर शासन की उदासीनता को दर्शाता है। हमारी इस विशेष रिपोर्ट के माध्यम से जिला कलेक्टर एवं उच्च प्रशासन से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की जाती है:
त्वरित मेडिकल बोर्ड का गठन: नीरा बाई पोट्टाम का स्वास्थ्य परीक्षण कराकर तत्काल ‘विकलांगता प्रमाण पत्र’ जारी किया जाए।
पेंशन योजना से जोड़ा जाए: प्रमाण पत्र के आधार पर बिना किसी विलंब के प्रतिमाह दिव्यांगता पेंशन स्वीकृत की जाए।
राशन कार्ड एवं अन्य लाभ: नीरा बाई को तत्काल प्रभाव से राशन कार्ड का लाभ और अन्य शासकीय योजनाओं से लाभान्वित किया जाए।
लापरवाह अधिकारियों पर कार्रवाई: वर्षों से इस गरीब आदिवासी परिवार को चक्कर कटवाने वाले जिम्मेदार कर्मचारियों व अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
यदि प्रशासन समय रहते जागता है और इस दिव्यांग युवती को उसका अधिकार दिलाता है, तभी “अंतिम व्यक्ति तक विकास” के सरकारी दावों को सत्य माना जाएगा।