तकनीकी निरीक्षक ने बुना शेल कंपनियों का मायाजाल…???
SECL के रामपुर प्रोजेक्ट में
‘पांडे राज’
भ्रष्टाचार का मेगा प्रोजेक्ट: सरकारी कुर्सी की आड़ में कोयला, ट्रांसपोर्ट और डीओ सिंडिकेट पर कब्जा, ‘जय अंबे’ और ‘विनायक’ के साथ साठगांठ का खुलासा…!
शहडोल/बिलासपुर: साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड (SECL) के सोहागपुर एरिया अंतर्गत आने वाला रामपुर बटूरा मेगा प्रोजेक्ट अब कोयला उत्पादन से ज्यादा ‘काले कारोबार’ के सिंडिकेट के लिए सुर्खियों में है। यहाँ तैनात तकनीकी निरीक्षक जितेंद्र पांडे पर सरकारी पद का दुरुपयोग कर एक समानांतर साम्राज्य खड़ा करने के सनसनीखेज आरोप लगे हैं। सूत्रों की मानें तो पांडे ने रसूख और सांठगांठ के दम पर खदान से लेकर बिलासपुर मुख्यालय तक भ्रष्टाचार की ऐसी ‘अदृश्य दीवार’ खड़ी कर दी है, जिसे लांघ पाना किसी आम ट्रांसपोर्टर या अधिकारी के बस की बात नहीं है।
मुनीम से ‘टाइकून’ बनने का रहस्य: आर्या आकृति और समीरा फर्म का सच
इस पूरे खेल में सबसे चौंकाने वाला नाम मनोज गुप्ता का उभरकर सामने आया है। कभी रोड सेल में मामूली मुनीम का काम करने वाला मनोज गुप्ता आज अचानक बड़े कारोबारी के रूप में कैसे स्थापित हो गया? क्षेत्र में चर्चा है कि ‘आर्या आकृति एसोसिएट्स’ और ‘समीरा’ जैसी फर्में महज कागजी मुखौटा (Shell Companies) हैं, जिनके पीछे असली दिमाग और ताकत जितेंद्र पांडे की है। इन फर्मों के जरिए करोड़ों के टेंडर और कार्यों को प्रभावित किया जा रहा है।
कोयले की ‘ग्रेडिंग’ में बड़ा खेल: माइनस 100 मिमी और स्टीम का गणित
सिर्फ ट्रांसपोर्ट ही नहीं, बल्कि खदान के भीतर कोयले की गुणवत्ता और उसके वर्गीकरण में भी भारी हेरफेर के आरोप हैं। सूत्रों के मुताबिक, ‘जय अंबे’ कंपनी के साथ मिलकर एक खास सिंडिकेट चलाया जा रहा है। माइनस 100 मिमी श्रेणी के कोयले को लेकर मनचाही प्राथमिकता तय की जाती है और ‘स्टीम’ गुणवत्ता के नाम पर पसंदीदा कारोबारियों को लाभ पहुँचाया जा रहा है। यह सीधे तौर पर सरकारी राजस्व को चूना लगाने और चहेतों की जेब भरने का व्यवस्थित तंत्र है।
बिलासपुर मुख्यालय के ‘चक्कर’ और राजस्थान का कनेक्शन
जितेंद्र पांडे की सक्रियता केवल सोहागपुर तक सीमित नहीं है। बताया जाता है कि वे महीने में कई बार बिलासपुर (SECL मुख्यालय) की गुप्त यात्राएं करते हैं। इन यात्राओं का मकसद उच्चाधिकारियों से सेटिंग और कारोबारी नेटवर्क को विस्तार देना बताया जा रहा है। वहीं, कोयला परिवहन में राजस्थान की कंपनी ‘विनायक ट्रांसपोर्ट’ की एंट्री ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय ट्रांसपोर्टरों को हाशिए पर धकेलकर एक विशेष बाहरी नेटवर्क को संरक्षण देना इस ‘काले साम्राज्य’ की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
लोहे से लेकर लोडर तक… हर तरफ कब्जा
रामपुर बटूरा प्रोजेक्ट के भीतर लोडिंग पॉइंट, कांटा घर, बूम बैरियर और लेवलिंग जैसे संवेदनशील स्थानों पर पांडे समर्थित समूह का वर्चस्व है। यहाँ तक कि वाहन संख्या CG 12 BS 8275 (लोडर) जैसे संसाधनों का उपयोग भी इसी सिंडिकेट के हितों को साधने के लिए किया जा रहा है। छोटे और स्वतंत्र ट्रांसपोर्टरों में भारी आक्रोश है, लेकिन सिंडिकेट के खौफ और प्रशासनिक शह के कारण कोई आवाज उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
सवालों के घेरे में प्रबंधन: क्या महाप्रबंधक की मौन सहमति है?
इतने बड़े पैमाने पर चल रहे इस ‘समांतर सिस्टम’ ने सोहागपुर एरिया के महाप्रबंधक बी.के. जेना की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि:
- क्या एक छोटा सा तकनीकी निरीक्षक पूरे सिस्टम को हाईजैक कर सकता है?
- क्या उच्च प्रबंधन को इस भ्रष्टाचार की भनक नहीं है, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं?
- बिलासपुर मुख्यालय के वे कौन से ‘आका’ हैं जो पांडे के इस साम्राज्य को कवच प्रदान कर रहे हैं?