गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही: पीएम आवास गबन की जांच के नाम पर महज ‘खानापूर्ति’, गांव पहुंचे अधिकारी पर हितग्राहियों के घर तक नहीं गए
मोहम्मद शाकिब खान मुख्य संवाददाता, गौरेला
प्रधानमंत्री आवास योजना में बड़े फर्जीवाड़ा का पर्दाफाश करता हितग्राही का यह कबूलनामा, देखें वीडियो
गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही: जिले की ग्राम पंचायत कोरजा में प्रधानमंत्री आवास योजना की राशि गबन के मामले में अब एक नया और हैरान करने वाला मोड़ आ गया है। 30 दिसंबर 2025 को कलेक्टर से की गई शिकायत के महीनों बाद आखिरकार जांच अधिकारी गांव तो पहुंचे, लेकिन यह जांच महज़ एक ‘दिखावा’ और ‘लीपापोती’ साबित हुई।
आरोप है कि जांच के लिए आए अधिकारी ने न तो असली पीड़ितों (आवास हितग्राहियों) से मुलाकात की और न ही उन अधूरे मकानों तक जाकर वस्तुस्थिति (Ground Reality) जानने की जहमत उठाई, जिनके नाम पर मस्टररोल में फर्जीवाड़ा कर रुपये निकाले गए हैं।
दफ्तर में बैठकर हुई ‘कागजी जांच’:
ग्रामीणों और शिकायतकर्ता का आरोप है कि जांच अधिकारी केवल पंचायत भवन या किसी निश्चित स्थान तक ही गए और वहीं से वापस लौट गए।
आरोपियों से ही पूछताछ!: सूत्रों के अनुसार, अधिकारी ने कथित तौर पर केवल उन्हीं लोगों (सरपंच, सचिव आदि) से मुलाकात की जिन पर गबन के गंभीर आरोप लगे हैं।
हितग्राहियों की अनदेखी: जिन गरीबों का हक मारा गया है और जो अपने अधूरे आशियाने के पास बैठकर जांच टीम का इंतजार कर रहे थे, उनकी कोई सुध नहीं ली गई।
बिना हितग्राहियों के बयान दर्ज किए और बिना मौका-मुआयना किए, भला गबन की निष्पक्ष जांच कैसे संभव है?
मिलीभगत और संरक्षण की बू:
जांच अधिकारी का यह रवैया सीधे तौर पर इस ओर इशारा करता है कि पूरे सिस्टम में कहीं न कहीं भ्रष्टाचारियों को बचाने का खेल चल रहा है।
अगर मस्टररोल में फर्जी हाजिरी भरी गई थी, तो क्या अधिकारी ने मौके पर जाकर उन ‘फर्जी मजदूरों’ की पहचान की?
क्या अधिकारी ने हितग्राहियों से पूछा कि उन्हें आवास की कितनी किश्तें मिली हैं?
बिना ग्राउंड जीरो पर गए अधिकारी अपनी जांच रिपोर्ट में क्या लिखेंगे?
ये ऐसे सवाल हैं जो जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाते हैं। यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह दौरा केवल कलेक्टर कार्यालय में लंबित शिकायत की फाइल को बंद करने की एक औपचारिकता (खानापूर्ति) मात्र था।
कलेक्टर के हस्तक्षेप की दरकार:
ग्राम पंचायत कोरजा का यह मामला अब सिर्फ एक पंचायत के भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर उठते भरोसे का भी मामला बन गया है।
ग्रामीणों की मांग है कि:
इस ‘दिखावटी जांच’ को रद्द किया जाए।
जिला स्तर से किसी अन्य वरिष्ठ और निष्पक्ष अधिकारी की टीम गठित कर गांव भेजी जाए।
जांच टीम अनिवार्य रूप से हर एक हितग्राही के घर जाकर भौतिक सत्यापन (Physical Verification) करे और उनके बयान दर्ज करे।
अगर अब भी प्रशासन कुंभकर्णी नींद से नहीं जागता है और निष्पक्ष जांच नहीं होती है, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि गरीबों के हक का पैसा डकारने वालों को ऊपर तक संरक्षण प्राप्त है।