पुराने आरोप, नई पुलिसिंग और पांच महीने बाद जांच की हलचल—क्या अब मिलेगा पीड़ित को न्याय?

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शहडोल। बुढ़ार थाने में पदस्थ प्रधान आरक्षक 185 चेतराम कौशिक के खिलाफ लगाए गए कथित रिश्वत और वसूली के आरोपों का मामला एक बार फिर चर्चा में है। मार्च 2026 में सामने आए आरोप, उसके बाद 18 मार्च को की गई शिकायत, 30 मार्च को दर्ज किए गए कथन और फिर कई महीनों बाद 14 अगस्त को जारी पुलिस नोटिस ने पूरे प्रकरण को नए सिरे से महत्वपूर्ण बना दिया है। खास बात यह है कि इस दौरान शहडोल जिले में पुलिस नेतृत्व भी बदल चुका है। अब जिले की कमान नए पुलिस अधीक्षक डॉ. संजय कुमार अग्रवाल के हाथों में है।
मामले की शुरुआत मार्च में उस समय हुई थी, जब बुढ़ार क्षेत्र में पदस्थ प्रधान आरक्षक चेतराम कौशिक के खिलाफ कथित तौर पर रिश्वत मांगने और लेने के आरोप सार्वजनिक हुए। आरोपों से संबंधित ऑडियो-वीडियो और डिजिटल भुगतान से जुड़े साक्ष्यों की चर्चा भी सामने आई थी। इसके बाद 18 मार्च 2026 को प्रधान आरक्षक के विरुद्ध शिकायत प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख वर्तमान एसडीओपी नोटिस में स्पष्ट रूप से दर्ज है।
शिकायत की जांच अनुविभागीय अधिकारी पुलिस, धनपुरी द्वारा की जा रही थी। जांच के दौरान शिकायतकर्ता को नोटिस जारी किया गया और 30 मार्च 2026 को वह जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित हुआ, जहां उसके कथन दर्ज किए गए। इसके बाद शिकायत में लगाए गए आरोपों के समर्थन में डिजिटल साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए समय दिया गया। लेकिन 14 अगस्त को जारी नोटिस में पुलिस का कहना है कि निर्धारित समय के बावजूद शिकायतकर्ता द्वारा कार्यालय में उपस्थित होकर साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।
यहीं से मामले का सबसे बड़ा सवाल सामने आता है—जब मार्च में शिकायत हो चुकी थी, 30 मार्च को कथन भी दर्ज हो चुके थे, तो डिजिटल साक्ष्यों की प्रक्रिया अगस्त तक क्यों खिंची? इसका स्पष्ट जवाब अभी सामने नहीं आया है। पुलिस नोटिस में देरी के कारणों का विस्तृत उल्लेख नहीं है।
इसी बीच शहडोल में पुलिस नेतृत्व बदल गया। मध्यप्रदेश शासन ने जुलाई में आईपीएस अधिकारियों के तबादले किए, जिसमें संजय कुमार अग्रवाल को शहडोल का नया पुलिस अधीक्षक बनाया गया और तत्कालीन एसपी रामजी श्रीवास्तव को एआईजी, पुलिस अकादमी भौंरी पदस्थ किया गया।  9 जुलाई को संजय कुमार अग्रवाल ने शहडोल एसपी का पदभार ग्रहण किया।
नए एसपी के आगमन के साथ जिले में पुलिसिंग को लेकर उम्मीदें भी बढ़ी हैं। अपनी शुरुआती प्राथमिकताओं में संजय अग्रवाल ने पारदर्शी, संवेदनशील और जवाबदेह पुलिसिंग, अपराध नियंत्रण तथा आमजन की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई को प्राथमिकता बताया है।  पदभार संभालने के बाद उन्होंने पुलिस व्यवस्था में सक्रियता भी दिखाई है। जुलाई में यातायात थाने के औचक निरीक्षण के दौरान रिकॉर्ड, सीसीटीवी और पुलिसकर्मियों की कार्यप्रणाली की समीक्षा की गई।
इसी पृष्ठभूमि में 14 अगस्त का नोटिस इस पुराने प्रकरण को नया संदर्भ देता है। यह कहना अभी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि नए एसपी के आने के बाद ही इस मामले की जांच शुरू हुई, क्योंकि शिकायत 18 मार्च को हो चुकी थी और 30 मार्च को शिकायतकर्ता के कथन भी दर्ज हुए थे। लेकिन यह जरूर सवाल बनता है कि शिकायत और कथन के बाद मामला कई महीनों तक किस स्तर पर लंबित रहा और अगस्त में दोबारा डिजिटल साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए नोटिस क्यों जारी करना पड़ा।
पीड़ित पक्ष और आम लोगों की नजर अब नए पुलिस नेतृत्व पर है। लोगों की अपेक्षा है कि पुराने प्रकरणों में यदि शिकायतें लंबित हैं तो उनकी निष्पक्ष समीक्षा हो, शिकायतकर्ता और संबंधित पुलिसकर्मी दोनों का पक्ष सुना जाए और उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों की तकनीकी जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाए।
मध्यप्रदेश शासन की मंशा भी पुलिस व्यवस्था को अधिक जवाबदेह और आमजन के प्रति संवेदनशील बनाने की है। ऐसे में यह प्रकरण नए एसपी के लिए भी एक परीक्षा की तरह देखा जा सकता है—क्या पुराने आरोपों पर निष्पक्ष जांच आगे बढ़ेगी, क्या डिजिटल साक्ष्यों की सत्यता जांची जाएगी और यदि आरोप सही पाए गए तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी?
फिलहाल 21 अगस्त  को शिकायतकर्ता को एसडीओपी धनपुरी कार्यालय में उपस्थित होकर उपलब्ध डिजिटल साक्ष्य प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। अब आगे की जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों के समर्थन में कौन-कौन से साक्ष्य सामने आते हैं और पुलिस उन साक्ष्यों की किस तरह जांच करती है।
मार्च से अगस्त तक की यह पूरी टाइमलाइन एक सवाल जरूर छोड़ती है—शिकायत के बाद न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों हुई और क्या नए पुलिस नेतृत्व में अब इस मामले को उसके अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाया जाएगा?

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