जब भवन है, संसाधन हैं, छात्र हैं….तो आखिर सरकारी लॉ कॉलेज क्यों नहीं, विधि शिक्षा पर उपेक्षा का आरोप,जनआंदोलन की आहट जनसुनवाई में गूंजा छात्रों का दर्द

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जब भवन है, संसाधन हैं, छात्र हैं….तो आखिर सरकारी लॉ कॉलेज क्यों नहीं, विधि शिक्षा पर उपेक्षा का आरोप,जनआंदोलन की आहट जनसुनवाई में गूंजा छात्रों का दर्द
((((जनसुनवाई में हर सप्ताह सड़क, पानी, बिजली और राशन जैसी समस्याएं पहुंचती हैं, लेकिन इस बार कलेक्ट्रेट में जो आवाज गूंजी उसने सीधे शिक्षा व्यवस्था, जनप्रतिनिधियों और शासन की प्राथमिकताओं पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया।
कटनी के युवा अधिवक्ता एवं विधि छात्र आयुष तोमर हजारों छात्र-छात्राओं के भविष्य की लड़ाई लेकर कलेक्टर आशीष तिवारी के सामने पहुंचे और एक ऐसा सवाल दाग दिया जिसका जवाब आज तक किसी जनप्रतिनिधि और शिक्षा विभाग के पास नहीं है.जिला बने वर्षों बीत गए। बड़े-बड़े वादे हुए। शिक्षा के नाम पर भाषण हुए। युवाओं के भविष्य पर राजनीति हुई। लेकिन हकीकत यह है कि आज भी जिले के गरीब और मध्यमवर्गीय छात्र एल.एल.बी. जैसी पढ़ाई के लिए निजी कॉलेजों की महंगी फीस भरने या दूसरे शहरों की धूल फांकने को मजबूर हैं। ))))

कटनी।। जिला कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में मंगलवार को एक ऐसा मुद्दा गूंजा जिसने केवल प्रशासन ही नहीं बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र और जनप्रतिनिधियों के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। यह मामला किसी व्यक्तिगत समस्या का नहीं बल्कि जिले के हजारों छात्र-छात्राओं के भविष्य, उच्च शिक्षा और न्यायिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ था।
कटनी के युवा अधिवक्ता एवं विधि छात्र आयुष तोमर हजारों विद्यार्थियों की आवाज बनकर जनसुनवाई में पहुंचे और कलेक्टर आशीष तिवारी को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपते हुए कटनी में शासकीय लॉ कॉलेज खोले जाने की मांग उठाई। कटनी जिला बने लगभग तीन दशक होने को हैं, लेकिन आज भी जिले के छात्रों को एल.एल.बी. एवं बी.ए.-एल.एल.बी. जैसी विधि शिक्षा प्राप्त करने के लिए निजी कॉलेजों या दूसरे शहरों का सहारा लेना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के छात्र केवल फीस, आवागमन और रहने की व्यवस्था के कारण अपने सपनों को बीच में छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कटनी में शासकीय तिलक स्नातकोत्तर महाविद्यालय जैसा विशाल और ऐतिहासिक संस्थान मौजूद है, जहां वर्षों से हजारों छात्र अध्ययन कर रहे हैं, तब आखिर आज तक यहां सरकारी स्तर पर लॉ की पढ़ाई शुरू क्यों नहीं हो सकी.
ज्ञापन में आयुष तोमर ने प्रशासन का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि वर्तमान में जिले के निजी लॉ कॉलेजों की परीक्षाओं का परीक्षा केंद्र तक तिलक कॉलेज को बनाया जाता है। इसका सीधा अर्थ है कि कॉलेज में पर्याप्त भवन, कक्षाएं और आधारभूत सुविधाएं मौजूद हैं। यानी जिस तिलक कॉलेज में निजी लॉ कॉलेजों की परीक्षाएं कराई जाती हैं, उसी कॉलेज में आज तक विधि की पढ़ाई शुरू नहीं की गई। यानी भवन है, संसाधन हैं, व्यवस्था है, लेकिन इच्छाशक्ति नहीं है। यदि शासन इच्छाशक्ति दिखाए तो शिफ्ट प्रणाली के माध्यम से आसानी से एल.एल.बी. और बी.ए.-एल.एल.बी. की कक्षाएं संचालित की जा सकती हैं।
इतना ही नहीं, शहर का पुराना जिला न्यायालय भवन वर्तमान में खाली पड़ा हुआ है क्योंकि न्यायालय का स्थानांतरण झिंझरी हो चुका है। ऐसे में उस भवन का उपयोग विधि शिक्षा के लिए किया जाना कटनी के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय साबित हो सकता है।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि विधि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं बल्कि संविधान, अधिकार, न्याय और सामाजिक जिम्मेदारी को समझने का आधार है। यदि सरकारी लॉ कॉलेज खुलता है तो आने वाले समय में जिले से उत्कृष्ट अधिवक्ता, न्यायविद, न्यायिक अधिकारी और सामाजिक नेतृत्वकर्ता निकल सकते हैं।
जनसुनवाई में उठी इस मांग ने एक बार फिर जिले के जनप्रतिनिधियों और शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर के बुद्धिजीवियों का कहना है कि मेडिकल, इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा की तरह विधि शिक्षा भी आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है, लेकिन कटनी के छात्रों को अब तक इससे वंचित रखा गया है।
फिर सवाल वही उठता है
जनसुनवाई में उठी यह मांग अब धीरे-धीरे छात्र हितों का बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। शहर के युवाओं में यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर हर चुनाव में युवाओं के भविष्य की बात करने वाले नेता इस मूलभूत आवश्यकता पर अब तक मौन क्यों हैं। कटनी जैसे बड़े जिले में आज तक सरकारी लॉ कॉलेज का न होना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि शिक्षा के प्रति उदासीनता माना जा रहा है।
राजनीतिक रूप से भी यह मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। क्योंकि यह केवल एक कॉलेज की मांग नहीं बल्कि जिले के युवाओं के भविष्य, रोजगार, शिक्षा और न्यायिक पहचान से जुड़ा विषय है। आने वाले समय में यह मांग छात्र आंदोलन का रूप भी ले सकती है यदि शासन और प्रशासन ने इस दिशा में गंभीर पहल नहीं की।

अब पूरे जिले की निगाहें कलेक्टर कार्यालय, उच्च शिक्षा विभाग, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय और जनप्रतिनिधियों पर टिकी हुई हैं कि आखिर कटनी के छात्रों को उनका अधिकार कब मिलेगा।

 

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