19 खुली खदानें….दर्जनों से ज्यादा मौतों का दावा, फिर भी नहीं जागा प्रशासन 16 साल पुराने आदेश से लेकर 163.34 लाख के प्रस्ताव तक फाइलों में कैद सुरक्षा योजना शहर के बीच मौत के जलाशय, न फेसिंग न सुरक्षा इंतजाम जनसुनवाई में संदीप रजक ने कलेक्टर से उठाया गंभीर मुद्दा, तत्काल कार्रवाई का आश्वासन, 2010 के एसडीएम आदेश के पालन पर भी सवाल
19 खुली खदानें….दर्जनों से ज्यादा मौतों का दावा, फिर भी नहीं जागा प्रशासन
16 साल पुराने आदेश से लेकर 163.34 लाख के प्रस्ताव तक फाइलों में कैद सुरक्षा योजना शहर के बीच मौत के जलाशय, न फेसिंग न सुरक्षा इंतजाम
जनसुनवाई में संदीप रजक ने कलेक्टर से उठाया गंभीर मुद्दा, तत्काल कार्रवाई का आश्वासन, 2010 के एसडीएम आदेश के पालन पर भी सवाल
कटनी में मौत का खतरा किसी सुनसान जंगल में नहीं, बल्कि शहर की आबादी के बीच पल रहा है। वर्षों से पानी से लबालब 19 खुली खदानें बच्चों, नागरिकों और मवेशियों के लिए खुले मौत के कुएं बनी हुई हैं, लेकिन जिम्मेदार महकमे सुरक्षा की दीवार खड़ी नहीं कर सके। हैरानी यह कि खदानों को सुरक्षित करने के लिए वर्ष 2010 में आदेश, 163.34 लाख रुपए का प्रस्ताव और वर्षों से लगातार शिकायतें भी सामने आती रहीं, फिर भी जमीन पर न फेसिंग हुई, न पुख्ता बैरिकेडिंग। अब जनसुनवाई में पहुंचे संदीप रजक ने कलेक्टर के सामने सवाल खड़ा किया है—आखिर कितनी और जानें जाने के बाद प्रशासन इन खदानों को सुरक्षित करेगा
कटनी।। शहर की आबादी के बीच वर्षों से मौत का खतरा समेटे बैठी 19 खुली खदानें अब महज पुरानी खदानें नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा सवाल बन गई हैं। इन खदानों में गहरे पानी के बावजूद सुरक्षा फेसिंग, बैरिकेडिंग और अन्य सुरक्षात्मक इंतजाम नहीं होने से बच्चों, नागरिकों और मवेशियों के लिए लगातार खतरा बना हुआ है। शिकायतकर्ता संदीप रजक ने मंगलवार को जनसुनवाई में कलेक्टर के समक्ष यह गंभीर मामला उठाते हुए दावा किया कि वंशरूप वार्ड और कावसजी वार्ड की खदानों में अब तक दर्जनों से अधिक नागरिकों की जान जा चुकी है। उन्होंने खदानों को तत्काल सुरक्षित कराने और जिम्मेदार विभागों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की। कलेक्टर ने मामले में कार्रवाई का आश्वासन दिया है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि खदानों को सुरक्षित करने की मांग आज की नहीं है। वार्ड पार्षद सुमित्रा रावत द्वारा वर्ष 2023, 2024 और फिर 12 मई 2026 को आवेदन दिए जाने का उल्लेख शिकायत में किया गया है। नगर निगम अध्यक्ष मनीष पाठक द्वारा भी पत्राचार किए जाने तथा पूर्व राज्यमंत्री एवं विजयराघवगढ़ विधायक संजय पाठक द्वारा खदानों को सुरक्षित कर पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने का सुझाव दिए जाने की बात शिकायतकर्ता ने कही है। इसके बावजूद धरातल पर स्थायी सुरक्षा व्यवस्था नहीं होने का आरोप लगाया गया है।
163.34 लाख का प्रस्ताव, फिर बजट के अभाव में क्यों रुका काम
खुली खदानों के खतरे से नगर निगम भी अनजान नहीं रहा है। शिकायत में उल्लेख है कि खदानों में बैरीकेटिंग, घाट निर्माण,सौंदर्यीकरण और वर्षा जल संग्रहण जैसे कार्यों के लिए करीब 163.34 लाख रुपए की कार्ययोजना तैयार की गई थी। तत्कालीन कलेक्टर अवि प्रसाद द्वारा राज्य आपदा प्राधिकरण के न्यूनीकरण मद से राशि स्वीकृत कराने के लिए प्रस्ताव भेजे जाने की बात भी सामने आई है।
लेकिन सवाल यह है कि यदि प्रशासन ने समस्या को चिन्हित कर लिया था, कार्ययोजना तैयार हो चुकी थी और राशि का प्रस्ताव भी भेजा गया था, तो आज तक खदानों की सुरक्षा के लिए स्थायी काम क्यों नहीं हुआ। क्या बजट की कमी नागरिकों की जान के लिए सुरक्षा इंतजाम टालने का पर्याप्त कारण है।
2010 का आदेश भी बेअसर
मामले का एक और गंभीर पहलू वर्ष 2010 का प्रशासनिक आदेश है। शिकायत के अनुसार, खदानों को कचरे और मलबे से भरने तथा वहां लोक न्यूसेंस पैदा होने की शिकायत पर एसडीएम कटनी के समक्ष धारा 133 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत प्रकरण क्रमांक 417/2008 प्रस्तुत किया गया था। इसमें 7 जून 2010 को अंतिम आदेश पारित कर खदानों को किसी भी प्रकार से भरने, कचरा डालने पर प्रतिबंध लगाया गया था। शिकायतकर्ता के अनुसार, इसी आदेश में नगर निगम और मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को खदानों में गंदगी एवं लोक न्यूसेंस रोकने तथा खदानों को सुरक्षित करने के निर्देश भी दिए गए थे। यदि यह विवरण अभिलेखों से पुष्ट होता है तो करीब 16 वर्ष पुराने आदेश के अनुपालन की स्थिति स्वयं एक बड़ा प्रशासनिक सवाल बन जाती है।
खदानें जलाशय बनीं, सुरक्षा घेरा फिर भी गायब
नगर निगम के वरिष्ठ पार्षद एडवोकेट मिथलेश जैन द्वारा भी कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, एसडीएम और नगर निगम आयुक्त सहित संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर नगर निगम सीमा की पुरानी खदानों को संरक्षित करने की मांग किए जाने का उल्लेख शिकायत में है। शिकायत के अनुसार इन 19 खदानों में भारी मात्रा में पानी भरा है। कुछ जल स्रोतों से नगर निगम द्वारा पानी प्राप्त कर नागरिकों को सप्लाई किए जाने का भी दावा किया गया है। आसपास भूजल स्तर भी ऊंचा होने की बात कही गई है। ऐसे में ये खदानें एक तरफ जलस्रोत के रूप में महत्वपूर्ण हैं, तो दूसरी तरफ खुले और असुरक्षित होने के कारण संभावित दुर्घटनाओं का केंद्र भी बनी हुई हैं।
सबसे चिंताजनक स्थिति यह बताई गई है कि बच्चे और अन्य लोग इन जलाशयों में बिना रोक-टोक पहुंच जाते हैं और कई स्थानों पर नहाने तक की स्थिति बनी रहती है। ऐसे में बारिश और जलभराव के मौसम में दुर्घटना की आशंका और बढ़ जाती है।
मलबा डालकर खदानें भरने और जमीन बचाने का खेल
शिकायत में यह भी गंभीर आरोप लगाया गया है कि पूर्व में कुछ खदानों में कचरा और मलबा डालकर उन्हें भरने तथा जमीन के उपयोग/विक्रय के प्रयास किए जाते रहे हैं। इस संबंध में पूर्व में प्रशासनिक स्तर पर मामला भी पहुंचा था। यदि बंद पड़ी खदानें वास्तव में जलस्रोत हैं तो उनका संरक्षण आवश्यक है, और यदि वहां अवैध भराव या कब्जे की शिकायतें हैं तो प्रशासन को राजस्व, नगर निगम, खनिज और प्रदूषण नियंत्रण विभाग की संयुक्त जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।
कहां-कहां हैं ये खुली खदानें
शिकायत में शहर के अलग-अलग हिस्सों में स्थित खदानों का उल्लेख किया गया है। इनमें भट्टा मोहल्ला कच्चा सॉ मिल के पास काली माता मंदिर के पीछे दो खदानें, कब्रिस्तान के पास चौबे वार्ड, एसीई जीएम बंगलों के पीछे, ऑर्डिनेंस फैक्ट्री रोड, दानव बाबा मंदिर के पास व पीछे, भीमराव चौक से मुक्तिधाम रोड, नैन्सी स्कूल के पीछे दो खदानें, बरगवां-माधवनगर रोड, कच्छ सॉ मिल के पास दो खदानें, पाठक वार्ड, बारडोली कॉलेज के पीछे, कंचन खदान तथा श्मशान भूमि के पीछे दो खदानें शामिल बताई गई हैं।
अब सवाल कार्रवाई का नहीं, जवाबदेही का है
जनसुनवाई में मामला पहुंचने के बाद अब निगाहें प्रशासन पर हैं। नागरिकों की मांग है कि केवल निरीक्षण या पत्राचार तक सीमित रहने के बजाय सभी चिन्हित खदानों का भौतिक सत्यापन, सुरक्षा ऑडिट, सीमांकन, फेसिंग-बैरिकेडिंग और चेतावनी संकेतक लगाने की समयबद्ध कार्रवाई की जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि 163.34 लाख रुपए की प्रस्तावित योजना का क्या हुआ, 2010 के आदेश का कितना पालन हुआ, किन खदानों में अवैध भराव या कब्जे की शिकायतें सही पाई गईं और अब तक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार विभागों ने क्या कार्रवाई की।
शिकायतकर्ता संदीप रजक ने स्पष्ट किया है कि उनकी मांग किसी राजनीतिक दबाव के तहत नहीं बल्कि नागरिकों की सुरक्षा और सार्वजनिक भूमि के संरक्षण को लेकर है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि तत्काल कार्रवाई नहीं हुई तो जिला स्तरीय जनआंदोलन किया जाएगा।
शहर के बीच पानी से भरी 19 खुली खदानें और उनके चारों ओर सुरक्षा का अभाव यह अब केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि प्रशासन के सामने खड़ा वह सवाल है जिसका जवाब जमीन पर दिखाई देना चाहिए।