टाइल्स चमकीं, नल टूटे: धनपुरी में जिम्मेदारी शौचालय के बाहर ही छूट गई

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धनपुरी नगर पालिका क्षेत्र में इन दिनों स्वच्छता और सौंदर्यीकरण का अभियान पूरे शोर-शराबे के साथ चल रहा है। कहीं टाइल्स लग रही हैं, कहीं रंग-रोगन हो रहा है, तो कहीं दीवारों पर स्वच्छता के संदेश लिखे जा रहे हैं। बाहर से सब कुछ ऐसा दिखाया जा रहा है मानो शहर सफाई की मिसाल बनने जा रहा हो। लेकिन जैसे ही हकीकत के दरवाजे खुलते हैं, तस्वीर बदल जाती है।


धनपुरी नंबर 3 में State Bank of India के सामने स्थित सुलभ शौचालय इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। बाहर चमक, अंदर दम तोड़ती व्यवस्था। यहां जो लोग रोज उपयोग करने आते हैं, वही इसे सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं। नल तोड़ दिए गए, टोंटियां गायब, दीवारें गंदी, सीटें खराब और परिसर बदहाल। सुविधा चाहिए, लेकिन उसकी जिम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहता।


सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सरकारी संपत्ति को लोग अपनी दुश्मनी क्यों समझते हैं? जिस शौचालय का उपयोग खुद करना है, उसी को तोड़ने में कैसी बहादुरी दिखाई जा रही है? कुछ लोग ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे सार्वजनिक सुविधा नहीं, तोड़फोड़ का अभ्यास केंद्र हो। उपयोग भी करेंगे, नुकसान भी करेंगे, फिर कहेंगे व्यवस्था खराब है।


नगर पालिका पर भी कटाक्ष बनता है। जिम्मेदार अधिकारी शायद मान बैठे हैं कि स्वच्छता सिर्फ बाहर टाइल्स लगाने से आ जाएगी। अगर एक कर्मचारी को यहां नियमित बैठाकर निगरानी दी जाती, मामूली शुल्क लेकर रखरखाव कराया जाता, तो शायद हालात इतने शर्मनाक न होते। लेकिन यहां तो व्यवस्था भगवान भरोसे और जनता आदतों के भरोसे छोड़ दी गई है।


सच यह है कि धनपुरी की गंदगी में सिर्फ तंत्र नहीं, जनता भी बराबर की भागीदार है। जब तक लोग उपयोग की चीजों को बचाना नहीं सीखेंगे, तब तक लाखों रुपये खर्च कर भी हालात नहीं सुधरेंगे। नल टूटते रहेंगे, दीवारें गंदी होती रहेंगी और फिर जिम्मेदारों को कोसने का नया बहाना मिलता रहेगा।
स्वच्छता अभियान भाषणों से नहीं, व्यवहार से सफल होता है। धनपुरी को तय करना होगा कि उसे सुविधा चाहिए या सिर्फ शिकायत का अधिकार।

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