केंवची-अचानकमार-कोटा सड़क को नियमित रूप से चालू करने की मांग ने फिर पकड़ा जोर
घनश्याम ठाकुर सह संपादक की विशेष रिपोर्ट
केंदा-रतनपुर मार्ग के निर्माण में लगेंगे दो से तीन वर्ष, जर्जर वैकल्पिक सड़कों ने बढ़ाई परेशानी; क्षेत्रवासियों ने कहा—केंवची-अचानकमार-कोटा मार्ग ही बन सकता है बारहमासी जीवनरेखा
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही/गौरेला।
जिला गौरेला-पेंड्रा-मरवाही इन दिनों बदहाल सड़क यातायात व्यवस्था की मार झेल रहा है। संभागीय मुख्यालय बिलासपुर और राजधानी रायपुर को जोड़ने वाले प्रमुख सड़क मार्ग कहीं निर्माणाधीन हैं तो कहीं बदहाली की स्थिति में पहुंच चुके हैं। ऐसे में कब सड़क पर लंबा जाम लग जाए, कब किसी पुल-पुलिया की हालत आवागमन रोक दे और कब बारिश के बीच मार्ग वाहनों के लिए दुर्गम हो जाए—यह किसी को पता नहीं।
स्वास्थ्य सुविधाओं, उच्च शिक्षा, उच्च न्यायालय और राजधानी स्तर के विभिन्न प्रशासनिक एवं व्यावसायिक कार्यों के लिए आज भी जीपीएम जिले के लोगों को बिलासपुर और रायपुर पर निर्भर रहना पड़ता है। जिला गठन को छह वर्ष बीत जाने के बाद भी जिले की स्वास्थ्य और उच्च शिक्षा व्यवस्था अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी है। ऐसे में सुगम और सुरक्षित सड़क संपर्क यहां के लोगों के लिए सुविधा नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।
इसी पृष्ठभूमि में केंवची-अचानकमार-कोटा सड़क को नियमित रूप से चालू करने तथा इसके नवीनीकरण की मांग ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है।
केंवची-अचानकमार-कोटा पुराना मार्ग, आज फिर सबसे बड़ी जरूरत
गौरेला से बिलासपुर को जोड़ने वाला केंवची-अचानकमार-कोटा मार्ग इस क्षेत्र के सबसे पुराने सड़क मार्गों में शामिल है। अचानकमार टाइगर रिजर्व के अस्तित्व में आने के बाद इस मार्ग पर भारी वाहनों का आवागमन प्रतिबंधित कर दिया गया। छोटे वाहनों की आवाजाही हालांकि जारी रही, लेकिन वर्षों से समुचित नवीनीकरण नहीं होने के कारण सड़क के कई हिस्से जर्जर हो गए और धीरे-धीरे इस महत्वपूर्ण मार्ग का उपयोग भी कम होता चला गया।
इसके बाद केंदा-रतनपुर मार्ग को जीपीएम से बिलासपुर की ओर आवागमन के प्रमुख विकल्प के रूप में विकसित किया गया। आज इस मार्ग से प्रतिदिन बड़ी संख्या में छोटे-बड़े वाहन गुजरते हैं। लेकिन वर्तमान में यही सड़क निर्माणाधीन होने के कारण लोगों की परेशानी का सबसे बड़ा कारण बन गई है।
दो साल तक निर्माणाधीन रहेगा घाट सेक्शन
जानकारी के अनुसार कारीआम से केंदा तक लगभग 5.25 किलोमीटर का घाट सेक्शन है, जिसका टेंडर 25 जून 2026 को हुआ है। घाट कटिंग सहित इस हिस्से के निर्माण के लिए एनएच 45 सड़क परिवहन और राजमार्ग द्वारा ठेकेदार को 24 माह का समय दिया गया है।
यानी केवल इस घाट सेक्शन के निर्माण में ही लगभग दो वर्ष का समय निर्धारित है। मौसम, भौगोलिक परिस्थितियों और निर्माण की गति को देखते हुए यह अवधि कम या अधिक भी हो सकती है। ऐसे में आने वाले लंबे समय तक इस मार्ग पर यातायात प्रभावित रहने की आशंका बनी हुई है।
40-45 टन के लिए बनी सड़क पर 70-80 टन के वाहन!
केंदा-रतनपुर मार्ग एन एच 45 की समस्या केवल निर्माण तक सीमित नहीं है। इस मार्ग पर भारी वाहनों का अत्यधिक दबाव भी चिंता का विषय बन गया है। सड़क निर्माण के लिए तैयार किए गए स्टीमेट में लगभग 40-45 टन भार वाले वाहनों को ध्यान में रखा गया है, जबकि वर्तमान में कोलवाशरी से कोयला लेकर लगभग 70-80 टन भार वाले हाईवा और ट्रेलर बड़ी संख्या में इस मार्ग से गुजर रहे हैं।
बताया जा रहा है कि प्रतिदिन करीब 1200 कोयला वाहन इस मार्ग से आवागमन कर रहे हैं। परिणामस्वरूप जिन हिस्सों का निर्माण हो चुका है, उनमें भी सड़क बैठने और दरारें पड़ने की शिकायतें सामने आने लगी हैं।
तकनीकी जानकारों की चिंता है कि यदि इसी तरह क्षमता से कहीं अधिक भार वाले वाहनों का दबाव जारी रहा तो करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई जा रही सड़क की उम्र पर ही सवाल खड़ा हो सकता है। आशंका यह भी जताई जा रही है कि निर्माण के बाद यदि सड़क पर इसी तरह भारी वाहनों का अनियंत्रित दबाव बना रहा तो महज कुछ वर्षों में सड़क फिर क्षतिग्रस्त होने लगेगी।
पुल टूटने के बाद बढ़ी मुश्किलें
हाल ही में एक पुराने पुल पर बस के गुजरने के दौरान पुल का एक हिस्सा बीच से टूट गया था। इसके बाद कुछ दिनों तक यह मार्ग बंद रहा और आवागमन बुरी तरह प्रभावित हुआ। एनएच45 सड़क परिवहन और राजमार्ग के अधिकारियों के अनुसार सड़क के अर्थवर्क से संबंधित नए सिरे से स्टीमेट तैयार कर उच्च कार्यालय को भेजा गया है।
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि मुख्य मार्ग पर किसी कारण से यातायात बाधित होता है तो जीपीएम के पास सुरक्षित और मजबूत वैकल्पिक सड़क व्यवस्था आखिर कितनी है?
जोबाटोला-खोंगसरा-बेलगहना मार्ग भी मजबूरी का विकल्प
पुल टूटने के बाद छोटे वाहनों के लिए जोबाटोला से खोंगसरा-बेलगहना मार्ग को वैकल्पिक रास्ते के रूप में उपयोग किया जा रहा है। लेकिन यह मार्ग सिंगल रोड है और इसका बड़ा हिस्सा वन क्षेत्र से होकर गुजरता है। सड़क पुरानी और कई स्थानों पर जर्जर है तथा कुछ पुल-पुलियों की स्थिति भी चिंता पैदा करती है।
यातायात का अतिरिक्त दबाव पड़ने के कारण यह मार्ग भी अब पुनरुद्धार की मांग कर रहा है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि यह रास्ता फिलहाल मजबूरी का विकल्प तो हो सकता है, लेकिन बढ़ते यातायात का स्थायी समाधान नहीं।
इसलिए फिर याद आया केंवची-अचानकमार-कोटा मार्ग
ऐसे हालात में क्षेत्रवासियों की नजर फिर उसी पुराने रास्ते पर टिक गई है केंवची-अचानकमार-कोटा मार्ग।
लोगों का कहना है कि इस मार्ग के कई पुल-पुलिया आज भी मजबूत स्थिति में हैं। मुख्य समस्या सड़क के कुछ जर्जर हिस्सों की है, जिनका नवीनीकरण कर मार्ग को बेहतर बनाया जा सकता है। यदि यह सड़क नियमित और नियंत्रित रूप से चालू हो जाए तो जीपीएम से बिलासपुर और रायपुर की ओर आवागमन के लिए एक मजबूत वैकल्पिक संपर्क उपलब्ध हो सकता है।
क्षेत्रवासियों का तर्क है कि जब केंदा-रतनपुर मार्ग को पूर्ण रूप से सुचारू होने में दो से तीन वर्ष का समय लग सकता है और खोंगसरा मार्ग स्वयं जर्जर एवं सीमित क्षमता वाला है, तब केंवची-अचानकमार-कोटा मार्ग को नजरअंदाज करना व्यावहारिक नहीं होगा।
निर्माण स्वीकृत, टेंडर भी हुआ फिर कार्यादेश क्यों रुका?
महत्वपूर्ण बात यह है कि केंवची-अचानकमार-कोटा सड़क के निर्माण की स्वीकृति मिल चुकी है। छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री अरुण साव के प्रयासों से इस सड़क के निर्माण को स्वीकृति मिली है।
लोक निर्माण विभाग पेंड्रारोड की कार्यपालन अभियंता नित्या कुमारी के अनुसार केंवची से अचानकमार-कोटा सड़क का टेंडर हो चुका है और कार्य ठेकेदार को दिया जा चुका है। हालांकि फॉरेस्ट क्लियरेंस एवं वाइल्ड लाइफ की अनुमति के कारण अभी कार्यादेश जारी नहीं किया गया है।
यानी सड़क के निर्माण की प्रक्रिया कागजों पर आगे बढ़ चुकी है, लेकिन वन एवं वन्यजीव संबंधी स्वीकृतियां कार्य की राह में बाधा बनी हुई हैं।
धर्मजीत सिंह विधायक तखतपुर ने भी इस सड़क को चालू करने और निर्माण की आवाज उठाई है
तखतपुर विधायक धर्मजीत सिंह ने भी इस सड़क के जल्द से जल्द निर्माण की मांग की है। स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल होने आए धर्मजीत सिंह ने कांग्रेसी नेता अशोक शर्मा, सुखदेव सिंह मो नफीस से चर्चा के दौरान जानकारी दी कि उन्होंने इस मार्ग के निर्माण कार्य में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को पत्र लिखा है और इस वे स्वयं मुख्यमंत्री से मिलकर इस सड़क के निर्माण कार्य को जल्द से जल्द करानै की मांग करेंगे।
वन्यजीव संरक्षण के साथ रास्ता खोलने का सुझाव
क्षेत्रवासियों का कहना है कि वे वन्यजीव संरक्षण या पर्यावरणीय नियमों के विरोध में नहीं हैं। उनकी मांग केवल इतनी है कि जनसुविधा और वन्यजीव संरक्षण के बीच व्यावहारिक संतुलन बनाया जाए।
लोगों का सुझाव है कि यदि आवश्यक हो तो अभ्यारण्य प्रभावित क्षेत्र में सड़क के दोनों ओर फेंसिंग अथवा बैरिकेडिंग, निर्धारित गति सीमा, रात्रिकालीन यातायात के लिए विशेष नियम, निगरानी व्यवस्था और वन्यजीवों की सुरक्षा से जुड़े अन्य प्रावधान लागू किए जा सकते हैं।
क्षेत्रवासी बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि संरक्षित वन क्षेत्र में भी नियंत्रित एवं नियमानुसार सड़क यातायात संचालित किया जा सकता है। ऐसे में अचानकमार क्षेत्र के लिए भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कोई व्यावहारिक मॉडल तैयार किया जाना चाहिए।
मरीजों और कामकाजी लोगों की सबसे ज्यादा परेशानी
सड़कों की मौजूदा स्थिति का सबसे गंभीर असर उन लोगों पर पड़ रहा है जिन्हें रोजाना बिलासपुर या रायपुर आना-जाना पड़ता है। कामकाजी लोगों के साथ-साथ गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और उनके परिजनों के लिए सड़क पर घंटों फंसना किसी मुसीबत से कम नहीं।
एक जिला जो स्वास्थ्य, उच्च शिक्षा और बड़े प्रशासनिक संस्थानों के लिए दूसरे शहरों पर निर्भर हो, उसके लिए सड़क संपर्क जीवनरेखा के समान होता है। इसलिए क्षेत्रवासियों का कहना है कि केंवची-अचानकमार-कोटा मार्ग को केवल एक सड़क के रूप में नहीं, बल्कि जीपीएम की वैकल्पिक जीवनरेखा के रूप में देखा जाना चाहिए।
अब लोगों की निगाहें वन एवं वन्यजीव संबंधी स्वीकृतियों पर टिकी हैं। क्षेत्रवासियों की मांग है कि संबंधित विभाग आपसी समन्वय से ऐसी व्यवस्था तैयार करें, जिससे वन्यजीवों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो और आम जनता का आवागमन भी बाधित न हो।
क्योंकि जब एक रास्ता निर्माणाधीन हो, दूसरा जर्जर हो और तीसरे पर यातायात का दबाव लगातार बढ़ रहा हो, तब पुराने रास्ते को पुनर्जीवित करना केवल सुविधा का सवाल नहीं रह जाता—यह पूरे जिले की यातायात सुरक्षा और आपातकालीन संपर्क व्यवस्था का सवाल बन जाता है।