गरीब की झोपड़ी पर पूरा प्रशासन, रसूखदार के सामने कार्रवाई क्यों बेबस लिखित में बंद रखने का भरोसा, फिर भी संचालन शुरू,क्या स्वाद रेस्टोरेंट के सामने नगर निगम की कार्रवाई के हाथ बंधे हैं

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गरीब की झोपड़ी पर पूरा प्रशासन, रसूखदार के सामने कार्रवाई क्यों बेबस
लिखित में बंद रखने का भरोसा, फिर भी संचालन शुरू,क्या स्वाद रेस्टोरेंट के सामने नगर निगम की कार्रवाई के हाथ बंधे हैं
कटनी।। कलेक्ट्रेट एवं पुलिस अधीक्षक कार्यालय के समीप संचालित ‘स्वाद’ रेस्टोरेंट इन दिनों नगर में चर्चा का विषय बना हुआ है। मामला केवल रेस्टोरेंट के संचालन का नहीं, बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान दिए गए लिखित आश्वासन की खुलेआम अनदेखी का भी है। विगत दिवस नगर निगम की टीम वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर ‘स्वाद’ रेस्टोरेंट में कार्रवाई के लिए पहुंची थी। कार्रवाई के दौरान रेस्टोरेंट संचालक निलेश चौदहा ने नगर निगम अधिकारियों से वैधानिक प्रक्रिया पूरी करने के लिए समय मांगा और लिखित रूप से यह आश्वासन दिया कि जब तक आवश्यक वैधानिक अनुमति प्राप्त नहीं हो जाती, तब तक रेस्टोरेंट का संचालन पूर्णतः बंद रखा जाएगा।
नगर निगम अधिकारियों ने भी संचालक को स्पष्ट रूप से रेस्टोरेंट बंद रखने की हिदायत दी। लिखित आश्वासन मिलने के बाद टीम तत्काल कार्रवाई पूरी किए बिना वापस लौट गई, ताकि संचालक निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवश्यक अनुमति प्राप्त कर सके। लेकिन इसके बाद जो स्थिति सामने आई, उसने पूरे मामले पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कटनी में कानून के राज को लेकर उठते सवाल अब और गंभीर होते जा रहे हैं। एक तरफ गरीब और कमजोर व्यक्ति के छोटे से मकान पर कार्रवाई करने के लिए पूरा प्रशासनिक अमला, पुलिस बल और मशीनरी जुट जाती है। 20×20 के मकान पर बुलडोजर चलाकर सरकारी जमीन मुक्त कराने की उपलब्धि का ढिंढोरा पीटा जाता है। दूसरी तरफ जब मामला किसी रसूखदार तक पहुंचता है तो नोटिस, पत्राचार, आवेदन, चुनौती, स्टे और फिर कार्रवाई पर रोक—यह पूरा सिलसिला शुरू हो जाता है। यही दोहरा रवैया आज आम आदमी की सबसे बड़ी पीड़ा बन चुका है। गरीब के लिए बुलडोजर, रसूखदार के लिए प्रक्रिया
‘स्वाद’ रेस्टोरेंट का मामला इसी सवाल को फिर सामने खड़ा करता है। नगर निगम की टीम कार्रवाई के लिए पहुंची। संचालक ने लिखित रूप से कहा कि वैधानिक अनुमति मिलने तक रेस्टोरेंट बंद रहेगा। अधिकारियों ने भी संचालन बंद रखने की हिदायत दी। टीम लौट गई। लेकिन इसके बाद रेस्टोरेंट का संचालन फिर शुरू होने की बात सामने आई।
अब सवाल बेहद सीधा है,जिस व्यक्ति ने प्रशासन के सामने लिखित आश्वासन दिया, उसके द्वारा उसका पालन नहीं किए जाने पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई,क्या प्रशासनिक निर्देश केवल गरीब और कमजोर लोगों पर ही प्रभावी होते हैं।

यहां कानून को चुनौती मिलती है, वहां मशीनें दौड़ती हैं
गरीब के छोटे से मकान को अवैध बताने में प्रशासन को देर नहीं लगती। मशीनें पहुंचती हैं, पुलिस बल पहुंचता है, अधिकारी पहुंचते हैं और कार्रवाई के बाद सरकारी जमीन मुक्त कराने की खबर भी सामने आ जाती है। लेकिन जब सामने रसूखदार हो तो कार्रवाई से पहले लंबी प्रक्रिया क्यों। पहले चुनौती, फिर स्टे, फिर पत्राचार और अंततः कार्रवाई पर रोक—क्या यही रसूखदारों के लिए प्रशासनिक व्यवस्था है
यदि नियम सभी के लिए समान हैं तो फिर कार्रवाई की रफ्तार और तरीका अलग-अलग क्यों दिखाई देता है।

राजनीतिक पकड़ की चर्चा ने और बढ़ाए सवाल
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि संबंधित रेस्टोरेंट संचालक की राजनीतिक पकड़ मजबूत होने के कारण प्रशासन कार्रवाई करने में असहज नजर आता है। इन चर्चाओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है। क्योंकि यदि राजनीतिक प्रभाव का कोई दबाव नहीं है तो प्रशासन को बिना किसी संकोच के नियमानुसार कार्रवाई कर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यदि सब कुछ नियम के अनुसार है तो फिर गरीब के मकान और रसूखदार के प्रतिष्ठान के मामले में दिखाई देने वाला यह अंतर क्यों। यह केवल ‘स्वाद’ रेस्टोरेंट का मामला नहीं है। यह उस आम नागरिक का सवाल है जो वर्षों से यह देखता आया है कि कमजोर पर नियम तेजी से लागू होते हैं और प्रभावशाली के मामले में नियमों की किताब अचानक मोटी हो जाती है। मुख्यमंत्री और नगरीय प्रशासन विभाग को ऐसे मामलों में केवल रिपोर्ट मंगाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह जांच होना चाहिए कि क्या कटनी में अवैध निर्माण और अवैध संचालन के खिलाफ कार्रवाई राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव से मुक्त होकर हो रही है।

नगर निगम और जिला प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए
क्या रेस्टोरेंट के पास सभी आवश्यक वैधानिक अनुमतियां हैं,क्या भवन का नक्शा स्वीकृत है, क्या संचालन की अनुमति है, यदि अनुमति नहीं है तो लिखित आश्वासन के बावजूद संचालन कैसे शुरू हुआ और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई। क्योंकि गरीब के 20×20 के मकान पर बुलडोजर चलाना आसान है, लेकिन रसूखदार के खिलाफ कानून की कलम चलाने में यदि प्रशासन के हाथ-पैर फूलने लगें, तो सवाल केवल एक प्रतिष्ठान का नहीं पूरे शासन-प्रशासन की निष्पक्षता का है।

अधिकारी का पक्ष जानने का प्रयास

इस संबंध में संबंधित अधिकारी अंशुमन सिंह से दूरभाष के माध्यम से जानकारी प्राप्त करने एवं उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने दूरभाष कॉल स्वीकार नहीं की। अधिकारी का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी समाचार में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

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