जब फाइल नहीं,किस्त चलती है विभागीय बहाली के बदले कर्मचारी से रिश्वत जब अपनों से ही वसूली… तब आम आदमी का क्या हाल? अपने ही विभाग के कर्मचारी से रिश्वत के रूप में महंगे मोबाइल की मांग और उसकी प्रथम किस्त के 5000 लेते लेखपाल रंगे हाथों गिरफ्तार

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जब फाइल नहीं,किस्त चलती है
विभागीय बहाली के बदले कर्मचारी से रिश्वत
जब अपनों से ही वसूली… तब आम आदमी का क्या हाल?
अपने ही विभाग के कर्मचारी से रिश्वत के रूप में महंगे मोबाइल की मांग और उसकी प्रथम किस्त के 5000 लेते लेखपाल रंगे हाथों गिरफ्तार
कटनी।। भ्रष्टाचार का सबसे भयावह चेहरा तब सामने आता है, जब किसी बाहरी या आम नागरिक से नहीं, बल्कि विभाग के भीतर ही अधिकारी अपने ही कर्मचारी से रिश्वत की मांग करने लगें। कटनी जिला पंचायत कार्यालय में सामने आया यह मामला इसी कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करता है। जिला पंचायत कटनी की स्थापना शाखा में पदस्थ लेखपाल सत्येंद्र सोनी को लोकायुक्त कार्यालय जबलपुर की टीम ने 5,000 की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया। यह रिश्वत किसी ठेके, अनुमति या निजी कार्य के लिए नहीं, बल्कि विभागीय कार्रवाई से बहाली जैसे संवेदनशील विषय पर मांगी गई थी।
बहाली के बदले महंगा मोबाइल फिर किस्तों में रिश्वत
आवेदक आशीष कुमार दुबे ने शिकायत दर्ज कराई थी कि वर्ष 2024 में उनके विरुद्ध लोकायुक्त की ट्रैप कार्रवाई हुई थी, जिसके बाद वे निलंबित कर दिए गए थे। बहाली के लिए उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, जहाँ से मार्च 2025 में स्पष्ट आदेश आया कि मामले में नियमानुसार कार्रवाई करते हुए निर्णय लिया जाए। इसी आदेश के अनुपालन के नाम पर आशीष कुमार दुबे जब जिला पंचायत कटनी के सीईओ कार्यालय पहुँचे, तो स्थापना शाखा में पदस्थ सत्येंद्र सोनी ने बहाली की फाइल आगे बढ़ाने के एवज में करीब 50,000 कीमत का Vivo V70 मोबाइल रिश्वत के रूप में मांग लिया। पैसे न होने की बात कहने पर रिश्वत को किस्तों में लेने की सहमति बनी।
पहली किस्त के रूप में 5,000 तय हुए और जैसे ही आवेदक यह राशि लेकर कार्यालय के कक्ष क्रमांक 9 पहुँचा, पहले से मौजूद लोकायुक्त की टीम ने विधिवत कार्रवाई करते हुए आरोपी लेखपाल को रंगे हाथों पकड़ लिया।
यह मामला सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अगर एक विभागीय अधिकारी, अपने ही कर्मचारी से, वह भी न्यायालय के आदेश के पालन के लिए रिश्वत मांग रहा है, तो यह मानना कठिन नहीं कि आम नागरिकों से हर छोटे-बड़े काम के बदले दाम तय होते होंगे।
अक्सर देखा गया है कि आम नागरिक डर, समय और झंझट के कारण शिकायत करने से बचता है। यही चुप्पी भ्रष्ट अधिकारियों की सबसे बड़ी ताकत बन जाती है। नतीजा यह होता है कि सरकारी योजनाएं फाइलों में दम तोड़ देती हैं और जरूरतमंद व्यक्ति दफ्तरों के चक्कर काटता रह जाता है, जब तक कि रिश्वत की रकम टेबल तक न पहुँचा दी जाए।
क्यों यह मामला बेहद गंभीर है
कटनी कोई बड़ा महानगर नहीं, बल्कि एक छोटा प्रशासनिक जिला है, जहाँ हर अधिकारी, हर कर्मचारी एक-दूसरे को जानता है। ऐसे में सवाल उठता है क्या यह पहली बार है जब जिला पंचायत में बहाली, पदस्थापना या फाइल आगे बढ़ाने के लिए रिश्वत मांगी गई? या यह केवल पहली बार पकड़ी गई घटना है? यह तथ्य और भी चिंताजनक है कि रिश्वत की मांग जिला पंचायत कटनी जैसे जिम्मेदार कार्यालय में हुई जहाँ से ग्रामीण विकास, रोजगार योजनाएं और जनकल्याण कार्यक्रम संचालित होते हैं। अगर यहाँ कर्मचारी ही सुरक्षित नहीं, तो ग्रामीण और आम नागरिक किससे न्याय की उम्मीद करें?

लोकायुक्त की कार्रवाई—सराहनीय, पर अधूरी
यह कहना गलत नहीं होगा कि लोकायुक्त कार्यालय जबलपुर की कार्रवाई ने एक अधिकारी को पकड़ा, लेकिन सवाल यह है क्या सिर्फ ट्रैप कार्रवाई ही समाधान है? क्या विभागीय तंत्र में बैठे बाकी लोग दूध के धुले हैं? आम नागरिक अक्सर इसलिए शिकायत नहीं करता क्योंकि उसे काम अटकने का डर होता है बदले की कार्रवाई का भय होता है और महीनों, वर्षों तक दफ्तरों के चक्कर लगाने की मजबूरी होती है यही डर भ्रष्ट अधिकारियों की सबसे बड़ी पूंजी बन चुका है।

यह कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन यह भी सच है कि ऐसी कार्रवाइयाँ अपवाद बनकर रह जाती हैं, जबकि भ्रष्टाचार नियम बनता जा रहा है। जरूरत है कि विभागीय कार्यप्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्ध निर्णय को सख्ती से लागू किया जाए, ताकि न्याय पाने के लिए किसी को किस्तों में रिश्वत न देनी पड़े। लोकायुक्त की यह कार्रवाई एक चेतावनी है।लेकिन सवाल अब भी कायम है,क्या हर आम आदमी इतनी हिम्मत और व्यवस्था जुटा सकता है कि वह शिकायत कर सके?कटनी जिला पंचायत में हुआ यह मामला केवल 5,000 की रिश्वत तक सीमित नहीं है। यह पूरे प्रशासनिक ढांचे की नैतिक दिवालियापन की स्वीकारोक्ति है। यहाँ रिश्वत किसी ठेकेदार, व्यापारी या आम नागरिक से नहीं ली जा रही थी बल्कि उसी विभाग के एक कर्मचारी से, जो पहले ही निलंबन, मुकदमे और मानसिक दबाव से गुजर चुका था। यह घटना बताती है कि अब भ्रष्टाचार बाहर नहीं, सिस्टम के भीतर से जन्म ले रहा है। एक कर्मचारी, जिसके पक्ष में माननीय न्यायालय का आदेश है, उसे भी बहाली के लिए महंगे मोबाइल और नगद किस्तों का सौदा करना पड़े तो यह शासन व्यवस्था पर सीधा तमाचा है।

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