ओटी के नाम पर “50-50 का खेल: सोहागपुर एरिया की खदानों में भ्रष्टाचार के आरोप, खान प्रबंधक कटघरे में
हाजिरी से लेकर ओवरटाइम तक वसूली का जाल, सरकारी खजाने पर पड़ रहा सीधा असरशहडोल।सोहागपुर एरिया की खदानों में लंबे समय से ओटी के नाम पर अनियमितताओं की चर्चा होती रही है, लेकिन अब यह मामला एक नए और अधिक संगठित रूप में सामने आया है। आरोप है कि ओवरटाइम की सुविधा अब केवल चहेते कर्मचारियों और यूनियन पदाधिकारियों तक सीमित रह गई है, जबकि आम कर्मचारियों को इसका लाभ लेने के लिए “50-50” व्यवस्था का सहारा लेना पड़ रहा है।
सूत्र बताते हैं कि यदि कोई कर्मचारी ओटी लेना चाहता है, या बिना काम किए हाजिरी दर्ज कराना चाहता है, तो उसे अपने वेतन का आधा हिस्सा प्रबंधन से जुड़े लोगों को देना पड़ता है। हाजिरी रजिस्टर में नाम दर्ज कराने से लेकर भुगतान तक पूरी प्रक्रिया कथित रूप से एक तय सिस्टम के तहत संचालित की जा रही है।
इस पूरे मामले में खान प्रबंधक राजेश खम्परिया का नाम प्रमुख रूप से सामने आ रहा है। कर्मचारियों का आरोप है कि करीब 8 से 10 लोगों की एक टीम इस पूरे खेल को अंजाम दे रही है, जिसमें बाबू स्तर से लेकर उच्च प्रबंधन तक की संलिप्तता की चर्चा है।
बताया जा रहा है कि हाजिरी रजिस्टर में किसी भी समय कर्मचारी की उपस्थिति दर्ज कर दी जाती है, चाहे वह वास्तविक रूप से कार्यस्थल पर मौजूद हो या नहीं। इसके बाद जब वेतन जारी होता है, तो आधा भुगतान कर्मचारी को और आधा कथित रूप से संबंधित अधिकारियों तक पहुंचता है। यह व्यवस्था न केवल श्रम कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि उत्पादन प्रणाली को भी कमजोर कर रही है।
यह पहली बार नहीं है जब सोहागपुर एरिया की खदानों में इस तरह के आरोप सामने आए हों। पूर्व में भी खुली और भूमिगत खदानों में इस प्रकार की गड़बड़ियों की शिकायतें मिल चुकी हैं। हालांकि, मुख्यालय और बिलासपुर स्तर से सख्त निर्देशों के बाद कुछ समय के लिए इस पर अंकुश लगा था, लेकिन अब फिर वही स्थिति लौटती नजर आ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की अनियमितताएं सीधे तौर पर सरकारी संसाधनों की बर्बादी हैं। जब ओवरटाइम जैसी व्यवस्थाओं का दुरुपयोग होता है, तो कंपनी की लागत बढ़ती है और उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। यही कारण है कि कोल इंडिया लिमिटेड जैसी बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भी आर्थिक दबाव और कार्यकुशलता की चुनौतियों से जूझती दिखाई देती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या महाप्रबंधक स्तर पर इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच और कार्रवाई की जाएगी, या फिर यह “50-50 का खेल” यूं ही चलता रहेगा। कर्मचारियों और क्षेत्रीय लोगों के बीच इस मुद्दे को लेकर असंतोष बढ़ता जा रहा है, लेकिन प्रबंधन की चुप्पी अब भी बनी हुई है, जो संदेह को और गहरा कर रही है।