तकनीकी निरीक्षक की शैल कंपनियों का काला साम्राज्य,रामपुर मेगा प्रोजेक्ट में जितेंद्र पांडेय पर गंभीर आरोप
सोहागपुर एरिया में प्रभाव का जाल, बिलासपुर तक जुड़े तारशैल फर्म, ट्रांसपोर्ट और कोयला कारोबार पर नियंत्रण के आरोप
शहडोल। एसईसीएल के सोहागपुर एरिया का रामपुर बटूरा मेगा प्रोजेक्ट, जो कंपनी के लिए उत्पादन और मुनाफे का प्रमुख केंद्र माना जाता है, इन दिनों गंभीर आरोपों के चलते चर्चा में है। यहां पदस्थ तकनीकी निरीक्षक जितेंद्र पांडेय को लेकर यह कहा जा रहा है कि वे अब केवल अपने पद की सीमाओं में नहीं हैं, बल्कि उन्होंने एक समानांतर कारोबारी नेटवर्क खड़ा कर लिया है, जिसका असर खदान से लेकर बाजार तक देखा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, जितेंद्र पांडेय की गतिविधियां अब प्रशासनिक दायरे से काफी आगे बढ़ चुकी हैं। वे ट्रांसपोर्टरों, डीओ होल्डरों और कोयला कारोबारियों के साथ सीधे समन्वय में काम करते हैं। उनकी छत्तीसगढ़ और बिलासपुर की लगातार यात्राएं भी इसी नेटवर्क का हिस्सा बताई जा रही हैं। बताया जाता है कि वे महीने में दो से तीन बार बिलासपुर जाकर वहां के अधिकारियों और कारोबारी समूहों से संपर्क साधते हैं।
इस पूरे मामले में मनोज गुप्ता का नाम भी प्रमुखता से सामने आ रहा है, जो पहले रोड सेल में मुनीम का काम करता था। अब वही मनोज गुप्ता कथित तौर पर एक बड़े कारोबारी के रूप में उभरा है। आरोप है कि “आर्या आकृति एसोसिएट्स” और “समीरा” नाम की फर्मों के माध्यम से बड़े स्तर पर काम संचालित किया जा रहा है, जिनका संचालन जितेंद्र पांडेय के प्रभाव में किया जा रहा है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्र में इसको लेकर लगातार चर्चाएं हैं।
सूत्र बताते हैं कि रामपुर बटूरा प्रोजेक्ट में एक लोडर जिसका नंबर सीजी 12 बीएस 8275 बताया जा रहा है, भी इसी नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों में भी इस नेटवर्क की सक्रियता की चर्चा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि काम केवल एक प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं है।
सबसे गंभीर आरोप खदान में कोयले के वर्गीकरण और वितरण को लेकर सामने आ रहे हैं। माइनस 100 मिमी श्रेणी के कोयले को लेकर प्राथमिकता देने और “स्टीम” गुणवत्ता तय करने के नाम पर प्रभाव डालने की बात कही जा रही है। सूत्रों के अनुसार, “जय अंबे” कंपनी के साथ मिलकर यह पूरा सिस्टम संचालित होता है, जहां कारोबारी हितों के अनुसार फैसले लिए जाते हैं।
रामपुर बटूरा ओपन कास्ट माइंस से निकलने वाले कोयले के परिवहन में भी एक विशेष नेटवर्क के सक्रिय होने की बात सामने आ रही है। “विनायक ट्रांसपोर्ट” नामक फर्म, जिसे राजस्थान की कंपनी बताया जाता है, के माध्यम से कोयले की सप्लाई होती है। आरोप है कि इस व्यवस्था में भी पांडेय और उनके करीबी लोगों की भूमिका अहम है।
इन परिस्थितियों में स्थानीय ट्रांसपोर्टरों में असंतोष बढ़ रहा है। उनका कहना है कि धीरे-धीरे स्वतंत्र और छोटे ट्रांसपोर्टर सिस्टम से बाहर होते जा रहे हैं और काम सीमित लोगों के पास सिमटता जा रहा है। दबाव और प्रतिस्पर्धा के चलते कोई खुलकर विरोध नहीं कर पा रहा है।
खदान के भीतर भी हालात सामान्य नहीं बताए जा रहे। लोडिंग, कांटा घर, बूम बैरियर और लेवलिंग जैसे हर स्तर पर एक ही प्रभावी समूह के सक्रिय होने की बात सामने आ रही है। इससे न केवल पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता भी प्रभावित हो रही है।
मामले में महाप्रबंधक बी.के. जेना की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि इतनी बड़ी गतिविधियां बिना उच्च स्तर की जानकारी के संभव नहीं हैं। यदि जानकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही, और यदि जानकारी नहीं है तो यह निगरानी व्यवस्था की गंभीर कमी को दर्शाता है।
रामपुर बटूरा मेगा प्रोजेक्ट, जो कभी कंपनी की ताकत का प्रतीक था, अब आरोपों के घेरे में है। यदि इन मामलों की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच होती है, तो यह स्पष्ट हो सकता है कि एक तकनीकी निरीक्षक के प्रभाव ने किस तरह एक व्यापक कारोबारी ढांचे का रूप ले लिया।
अब नजरें कंपनी मुख्यालय पर हैं कि वह इस मामले में क्या कदम उठाता है। समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा कर सकता है।