कमर में ट्यूब बांध तीन किलोमीटर घिसटकर मां नर्मदा की शरण में पहुंचता है दिव्यांग जोहन
गिरीश राठौड़
कमर में ट्यूब बांध तीन किलोमीटर घिसटकर मां नर्मदा की शरण में पहुंचता है दिव्यांग जोहन
“मां नर्मदा भूखे उठाती हैं लेकिन भूखे सोने नहीं देतीं”— संघर्ष , स्वाभिमान और उम्मीद की मार्मिक दास्तान
अमरकंटक -/पवित्र नगरी अमरकंटक जो मध्य प्रदेश के प्रमुख धार्मिक एवं आध्यात्मिक तीर्थस्थल में आस्था के बीच संघर्ष और जीवटता की एक ऐसी कहानी भी हर दिन लिखी जाती है जिसे देखकर संवेदनशील हृदय भी द्रवित हो उठता है ।
नगर परिषद अमरकंटक के वार्ड क्रमांक-2 बराती निवासी लगभग 40 वर्षीय जोहन सिंह मरावी , जो जन्म से नहीं बल्कि परिस्थितियों से भी पूरी तरह असहाय हो चुके हैं । आज भी जीवन से हार मानने को तैयार नहीं हैं ।दोनों पैरों से पूर्णतः दिव्यांग जोहन सिंह मरावी कमर में जीप-कार का ट्यूब बांधकर , हाथों के सहारे घिसटते हुए प्रतिदिन लगभग तीन किलोमीटर का कठिन सफर तय करते हैं । उनका गंतव्य होता है—मां नर्मदा मंदिर का मुख्य द्वार , जहां वे श्रद्धालुओं से प्राप्त होने वाली भिक्षा से अपनी वृद्ध एवं मानसिक रूप से अस्वस्थ मां के साथ किसी तरह दो वक्त की रोटी का इंतजाम करते हैं ।जोहन सिंह बताते हैं कि उनके पिता श्री बारेलाल सिंह मरावी लगभग तीस वर्ष पूर्व परिवार को छोड़कर कहीं चले गए थे । आज तक यह पता नहीं चल सका कि वे जीवित हैं या नहीं । परिवार की जिम्मेदारी मां और तीन बच्चों पर आ गई । उनकी दो बहनें—लमियां बाई और झमिया बाई—भी मानसिक रूप से अस्वस्थ रहती थीं । एक बहन का विवाह हुआ था , दूसरी अविवाहित रही । पांच वर्ष पहले बड़ी बहन और तीन वर्ष पूर्व छोटी बहन बीमारी के चलते इस दुनिया को अलविदा कह गईं । अब परिवार में केवल जोहन और उनकी मां ही रह गए हैं ।उन्होंने बताया कि उनका मूल निवास डिंडोरी जिले के करंजिया जनपद अंतर्गत ग्राम बरनई है । पिता दूसरी शादी कर मौसी को घर लाए थे लेकिन बाद में उन्हें भी छोड़कर चले गए । बाद में मौसी ने भी दूसरी शादी कर ली । इसके बाद मां और बेटे ने अमरकंटक को ही अपना आशियाना बना लिया ।
जोहन की मां कुछ समय तक स्थानीय होटलों में मजदूरी करती रहीं लेकिन अशिक्षित होने के कारण उन्हें नियमित काम और उचित मजदूरी नहीं मिल पाती थी । आज उनकी मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं रहती । फिर भी वे जंगल से लकड़ी लाकर किसी तरह चूल्हा जलाती हैं और बेटे के लिए भोजन बनाती हैं ।
सरकार से जोहन सिंह को दिव्यांग पेंशन के रूप में मात्र ₹600 प्रतिमाह मिलते हैं जो वर्तमान महंगाई में जीवनयापन के लिए पर्याप्त नहीं हैं । उनका कहना है कि उन्हें आज तक उज्ज्वला योजना का गैस कनेक्शन नहीं मिला और न ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत सस्ती दर पर राशन उपलब्ध हो पाता है । यदि राशन और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ समय पर मिल जाए तो उनके जीवन में काफी राहत आ सकती है ।
जोहन बताते हैं कि कल्याण सेवा आश्रम द्वारा उन्हें तीन पहियों वाली दिव्यांग साइकिल उपलब्ध कराई गई थी लेकिन रास्ते में चढ़ाई और घाट होने के कारण वे उसे चला नहीं पाते । कोई सहारा देने वाला नहीं मिलता इसलिए वह साधन भी उनके लिए बेकार साबित हो रहा है ।
वह कहते हैं, “मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूं । दस्तखत भी नहीं कर पाता , अंगूठा लगाता हूं । मेरी शादी भी नहीं हुई । मुझे कौन अपनी बेटी देगा? जब तक मां हैं , किसी तरह खाना मिल जाता है ।”
नर्मदा मंदिर के सामने बैठने वाले अन्य भिक्षुकों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कई लोग सक्षम होने के बावजूद भीख मांगते हैं । कुछ लोग भिक्षा में मिले सामान को बेच देते हैं और उनके परिवारजन आकर पैसे ले जाते हैं । यहां तक कि कुछ नारियल-प्रसाद बेचने वाली महिलाएं भी दानदाताओं से भिक्षा लेती दिखाई देती हैं । ऐसे लोगों के बीच वास्तविक जरूरतमंदों की पहचान कठिन हो जाती है ।
जोहन सिंह स्वयं किसी भी प्रकार का नशा नहीं करते । वे कहते हैं, “दानदाता जितना भी दे दें , मैं खुशी से स्वीकार करता हूं और उन्हें दिल से आशीर्वाद देता हूं ।”
करीब 20-25 वर्षों से अमरकंटक में रह रहे जोहन की आस्था मां नर्मदा पर अटूट है । उनकी आंखों में विश्वास झलकता है जब वे कहते हैं—
“मां नर्मदा भूखे उठाती हैं , लेकिन भूखे सोने नहीं देतीं । किसी न किसी रूप में सहायता मिल ही जाती है ।”
उन्होंने अपनी एक छोटी-सी इच्छा भी साझा की । यदि उन्हें बैटरी चालित ई-रिक्शा या उपयुक्त दिव्यांग वाहन मिल जाए तो मंदिर तक आना-जाना आसान हो जाएगा । अभी कई बार मजबूरी में ऑटो से घर जाना पड़ता है जिसके लिए ₹100 तक किराया देना पड़ता है ।
श्रद्धालु समय-समय पर उन्हें अनाज , पैसे , छाता , टॉर्च , जूते-चप्पल और अन्य आवश्यक सामग्री दान में देते हैं लेकिन रोजमर्रा की कई जरूरतें बाजार से खरीदनी पड़ती हैं । महंगाई लगातार बढ़ रही है फिर भी वे मुस्कुराकर कहते हैं—
“अब जितना भी जीवन बचा है , उसे हंसते-मुस्कुराते हुए ही जीना है । यही मेरा संकल्प है । हौसला ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है ।”
जोहन सिंह मरावी और उनकी मां दोनों अमरकंटक के स्थायी निवासी हैं । मतदाता सूची में उनके नाम दर्ज हैं और आधार कार्ड भी बना हुआ है । उनकी कहानी केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं बल्कि समाज और व्यवस्था के सामने यह प्रश्न भी खड़ा करती है कि क्या वास्तविक जरूरतमंदों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पूरी संवेदनशीलता के साथ पहुंच पा रहा है? जोहन की आंखों में आज भी उम्मीद बाकी है —