आरटीआई के तहत जानकारी देने में ग्राम पंचायत सचिव कविता राठौर की आनाकानी, सीईओ के आदेश के बावजूद थमाई आधी-अधूरी और अस्पष्ट जानकारी
मोहम्मद शाकिब खान मुख्य संवाददाता गौरेला
नियम 3(2) की आड़ में छिपाई जा रही है 15वें वित्त आयोग और निर्माण कार्यों की जानकारी, अपील के आदेश का भी नहीं हुआ पालन।
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही: जिले के जनपद पंचायत गौरेला अंतर्गत ग्राम पंचायत गोरखपुर में सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम 2005 का खुला मजाक उड़ाया जा रहा है। पंचायत स्तर पर हुए विकास कार्यों और लाखों रुपये के खर्च में पारदर्शिता लाने के बजाय, जन सूचना अधिकारी (पंचायत सचिव) द्वारा आरटीआई नियमों का तकनीकी और भ्रामक हवाला देकर जानकारी छिपाई जा रही है।
हद तो तब हो गई जब प्रथम अपीलीय अधिकारी (सीईओ जनपद पंचायत) के स्पष्ट आदेश के बावजूद आवेदक को न केवल आधी-अधूरी जानकारी दी गई, बल्कि जो दी गई वह भी पढ़ने लायक नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
आवेदक मोहम्मद शाकिब खान (निवासी- मकान-24, वार्ड क्र. 10, ककरैहा पारा, गोरखपुर) ने 19 मार्च 2026 को आरटीआई के तहत ग्राम पंचायत गोरखपुर से वर्ष 2024 से 2026 के बीच हुए विकास कार्यों, 15वें वित्त आयोग की आय-व्यय, मध्य क्षेत्र निधि के खर्च, और निर्माण कार्यों के बिल-वाउचर (Material and Labour) व मापन पुस्तिका (MB) की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं।
आवेदक ने कुल 5 बिंदुओं पर जानकारी चाही थी और स्पष्ट लिखा था कि यदि कोई जानकारी किसी अन्य अधिकारी (जैसे तकनीकी शाखा) से संबंधित है तो आरटीआई अधिनियम की धारा 6(3) के तहत आवेदन वहां स्थानांतरित कर दिया जाए।
सीईओ के आदेश को सचिव ने दिखाया ठेंगा:
समय सीमा के भीतर जानकारी न मिलने पर मामला प्रथम अपील में जनपद पंचायत गौरेला के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) के पास पहुंचा। सीईओ ने सुनवाई करते हुए आवेदक को सभी जानकारी प्रदान करने का स्पष्ट आदेश पारित किया। 
लेकिन ग्राम पंचायत गोरखपुर की जन सूचना अधिकारी/सचिव कविता राठौर ने अपने वरिष्ठ अधिकारी के आदेश को ही दरकिनार कर दिया और 7 मई 2026 को जारी अपने पत्र में एक नया पेंच फंसा दिया।
क्या है नियम 3(2) और कैसे हुआ इसका ‘सुविधाजनक’ दुरुपयोग?
जानकारी छिपाने के लिए पंचायत सचिव ने ‘छत्तीसगढ़ शासन, सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी सूचना का अधिकार नियम 2017 के नियम 3(2)’ का हवाला दिया।
क्या कहता है यह नियम?
इस नियम के अनुसार, “सूचना प्राप्त करने के लिए दिया गया प्रत्येक आवेदन केवल एक विषय-वस्तु (Single Subject Matter) तक ही सीमित होना चाहिए।” शासन ने यह नियम इसलिए बनाया था ताकि कोई व्यक्ति एक ही आवेदन में दर्जनों अलग-अलग विभागों (जैसे- पंचायत, राशन दुकान, और स्कूल) के बेतरतीब सवाल पूछकर प्रशासनिक कामकाज बाधित न करे।
गोरखपुर पंचायत में कैसे हुआ दुरुपयोग?
केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के स्पष्ट निर्देश हैं कि “एक विषय-वस्तु” की परिभाषा क्या है। आवेदक ने पंचायत के “विकास कार्यों और 15वें वित्त आयोग के खर्च” की जानकारी मांगी थी। जाहिर है कि किसी निर्माण कार्य की स्वीकृति, उसके बिल-वाउचर और उसकी मापन पुस्तिका (MB)—यह सब एक ही विषय-वस्तु के अभिन्न हिस्से हैं। एक ही निर्माण कार्य का बिल और उसी कार्य की MB दो अलग-अलग विषय कैसे हो सकते हैं?
लेकिन इसी नियम की आड़ लेकर सचिव ने केवल पहले बिंदु (स्वीकृत कार्यों की सूची) की जानकारी दी और बाकी 4 महत्वपूर्ण बिंदुओं (बिल-वाउचर, 15वां वित्त आयोग का खर्च, MB आदि) की जानकारी देने से साफ मना कर दिया, यह कहते हुए कि इनके लिए अलग-अलग आवेदन लगाएं।
वाह री पंचायत की पारदर्शिता!
जब बात रोजगार गारंटी के कार्यों की एक सामान्य सी (वह भी अस्पष्ट) सूची थमाने की थी, तो सचिव महोदया को कोई दिक्कत नहीं हुई। लेकिन जैसे ही आवेदक ने 15वें वित्त आयोग के लाखों के खर्च, निर्माण कार्यों के बिल-वाउचर और मापन पुस्तिका (MB) की अहम जानकारी मांगी, तो उन्हें अचानक ‘नियम 3(2)’ का कंठस्थ ज्ञान हो गया! 

एक ही कार्य के बिल और MB को ‘अलग-अलग विषय’ बताकर 4 बिंदुओं की जानकारी दबाना यह साफ संदेश देता है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
ऐसा लगता है कि विकास कार्यों के असली दस्तावेज पंचायत कार्यालय के बजाय सीधे भ्रष्टाचार की तिजोरी में बंद कर दिए गए हैं, जिन्हें बाहर निकालने से पंचायत का ‘विकास मॉडल’ बेनकाब हो जाएगा।
RTI अधिनियम की इन धाराओं का खुला उल्लंघन:
कानूनी जानकारों की मानें तो पंचायत सचिव का यह कृत्य सीधे तौर पर आरटीआई अधिनियम का उल्लंघन है:
अपीलीय आदेश की सीधी अवमानना [धारा 19(1)]: जब प्रथम अपीलीय अधिकारी (CEO) ने सभी जानकारी देने का आदेश दे दिया था, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने आवेदन को नियमानुसार वैध माना था। जन सूचना अधिकारी अपने वरिष्ठ अधिकारी के आदेश की समीक्षा नहीं कर सकतीं और न ही नियम 3(2) का बहाना बनाकर आदेश को खारिज कर सकती हैं।
आवेदन ट्रांसफर न करना [धारा 6(3)]: यदि मांगे गए बिल या MB तकनीकी शाखा से जुड़े थे, तो आवेदन को 5 दिनों के भीतर वहां ट्रांसफर करना वैधानिक दायित्व था, जो नहीं किया गया।
अस्पष्ट जानकारी देना ‘इनकार’ के बराबर [धारा 7]: जो एकमात्र सूची थमाई गई है, उसकी प्रिंट क्वालिटी इतनी खराब और अस्पष्ट है कि उसमें दर्ज आंकड़े पढ़े ही नहीं जा सकते। कानूनी रूप से ऐसी भ्रामक जानकारी देना, ‘जानकारी देने से मना करने’ (Deemed Refusal) के ही समान माना जाता है।
आगे की राह: राज्य सूचना आयोग में अपील
15वें वित्त आयोग के खर्चों और निर्माण कार्यों के बिलों पर जिस तरह पर्दा डाला गया है, उससे ग्राम पंचायत गोरखपुर में भारी अनियमितता की आशंका जन्म ले रही है। आवेदक मोहम्मद शाकिब खान ने स्पष्ट कर दिया है कि वे इस मामले को लेकर अब राज्य सूचना आयोग (द्वितीय अपील) का दरवाजा खटखटाएंगे और अपीलीय आदेश की अवहेलना करने वाली जन सूचना अधिकारी पर अधिनियम की धारा 20 के तहत जुर्माना व अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग करेंगे।