खाकी का ‘स्थाई बंदोबस्त’ और नाके पर रात भर ‘सेवा शुल्क’!

(शुभम तिवारी)
शहडोल।कायदे-कानून तो शायद आम जनता के लिए बनते हैं, ‘साहबों’ का तो अपना ही साम्राज्य चलता है! डेढ़ दशक से एक ही अनुभाग की मलाई चाट रहे हमारे निष्ठावान करिंदों का तबादला भी हो जाए, तो न्यायालय का सहारा लेकर वापसी का ‘अमृत’ पाना कौन सी बड़ी बात है? जब हुकूमत की मेहरबानी और कुर्सी का मोह इतना गहरा हो, तो खाकी का रुतबा क्यों न चमके? सुना है बीती रात वन जांच नाके पर साहबान रात भर ‘जनसेवा’ और ‘वसूली यज्ञ’ में लीन रहे। वाह रे व्यवस्था! एक ही जगह खूंटा गाड़कर नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाने का यह हुनर वाकई काबिले-तारीफ है। अब देखना यह है कि इस ‘अनंत निष्ठा’ पर साहबों की नींद खुलती है या वसूली का यह पावन दौर यूं ही निर्बाध चलता रहेगा!