शहडोल में मुरूम भुगतान पर बड़ा सवाल: जिले में स्वीकृत खदान नहीं, फिर भी पंचायतों में लाखों के बिल पास; हार्डवेयर दुकानों से दिखाई गई सप्लाई
शहडोल। मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य शहडोल जिले में सरकारी निर्माण कार्यों में कथित अनियमितताओं का एक और मामला सामने आया है। पहले चाय में ड्राई फ्रूट्स, पेंटिंग कार्य में सैकड़ों मजदूरों के भुगतान और कथित कागजी तालाबों के बाद अब पंचायतों में मुरूम खरीदी और भुगतान को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। पंचायत दर्पण पोर्टल पर अपलोड दस्तावेजों से पता चलता है कि जिले में मुरूम की एक भी स्वीकृत खदान नहीं होने के बावजूद निर्माण कार्यों के नाम पर लगातार मुरूम के बिल लगाए गए और लाखों रुपये का भुगतान भी किया गया। सामने आए दस्तावेज यह भी दर्शाते हैं कि कई स्थानों पर हार्डवेयर दुकानों से मुरूम की आपूर्ति दर्शाई गई है।
जनपद पंचायत सोहागपुर की ग्राम पंचायत झिरिया के दस्तावेज इस मामले का प्रमुख आधार बने हैं। पंचायत दर्पण पोर्टल पर अपलोड 28 जनवरी 2026 के एक बिल में एस.एन. हार्डवेयर द्वारा पीएम जनमन योजना अंतर्गत आंगनवाड़ी के पास पेवर ब्लॉक निर्माण कार्य के लिए 16 मात्रा मुरूम की दर 1700 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से 27,200 रुपये तथा छह पानी के टैंकर के 4,200 रुपये सहित कुल 31,400 रुपये का भुगतान दर्शाया गया है। इसी पंचायत में 28 जुलाई 2025 के एक अन्य बिल में मेसर्स कमल शर्मा द्वारा सीसी रोड निर्माण के लिए 6,000 घनफुट मुरूम का 66,000 रुपये तथा 600 घनफुट गिट्टी का 20,400 रुपये सहित कुल 90,720 रुपये का भुगतान दर्ज है। दोनों बिलों पर पंचायत की स्वीकृति और भुगतान संबंधी हस्ताक्षर भी मौजूद हैं।
यही नहीं, पंचायत दर्पण पर उपलब्ध अन्य दस्तावेजों में ब्यौहारी जनपद क्षेत्र की ग्राम पंचायतों के भी बिल सामने आए हैं। एक बिल में महाराज ट्रेडर्स एंड फोटोकॉपी सेंटर द्वारा 160 मात्रा मुरूम के लिए 80,000 रुपये तथा दूसरे बिल में अवधेश ट्रेडर्स द्वारा 165 मात्रा मुरूम के लिए 82,500 रुपये का भुगतान दर्ज है। ऐसे ही सैकड़ों बिल पोर्टल पर अपलोड हैं और लगातार भुगतान होने का रिकॉर्ड दिखाई दे रहा है।
दूसरी ओर जिला खनिज अधिकारी राहुल शांडिल्य का कहना है कि शहडोल जिले में वर्तमान में मुरूम की कोई स्वीकृत खदान संचालित नहीं है। वहीं जिला पंचायत के उपायुक्त (विकास) एवं अतिरिक्त मुख्य कार्यपालन अधिकारी एम.पी. सिंह ने कहा कि यदि पंचायतों में मुरूम का भुगतान किया गया है तो इसकी जांच कराई जाएगी कि सामग्री कहां से लाई गई और किस आधार पर उपयोग की गई।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जिले में वैध मुरूम खदान ही नहीं है तो निर्माण कार्यों में उपयोग की गई मुरूम कहां से आई? यदि क्रेशर की सामग्री का उपयोग हुआ तो भुगतान मुरूम के नाम पर क्यों किया गया, और यदि वास्तव में मुरूम लाई गई तो क्या उसके लिए वैध खनिज अनुमति और ई-ट्रांजिट पास उपलब्ध थे? लगातार सामने आ रहे दस्तावेजों ने पंचायतों में सामग्री खरीदी और भुगतान की प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। मामले की निष्पक्ष जांच ही यह स्पष्ट कर सकेगी कि सरकारी राशि का भुगतान वास्तविक सामग्री पर हुआ या फिर केवल कागजी बिलों के आधार पर।