उत्तर शहडोल वन मंडल में ‘तिकड़ी-राज’: तीन चेहरों के इर्द-गिर्द घूम रहा करोड़ों का टेंडर खेल

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उत्तर वन मंडल शहडोल में टेंडर प्रक्रिया का विवाद अब एक बड़े विस्फोट की ओर बढ़ रहा है। निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर अन्य ठेकेदारों ने अब शपथ पत्र  के साथ मोर्चा खोल दिया है। आरोप है कि विभाग के भीतर बैठा एक शक्तिशाली ‘सिंडिकेट’ पिछले कई वर्षों से सरकारी खजाने को चूना लगा रहा है। यदि उच्चस्तरीय जांच हुई, तो भ्रष्टाचार की एक ऐसी सल्तनत का खुलासा होगा जो सालों से पर्दे के पीछे से संचालित हो रही है।
शहडोल। उत्तर वन मंडल में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि अब यहां ‘पारदर्शिता’ शब्द बेमानी लगने लगा है। हाल ही में मेसर्स अखिलेश सिंह को मिली अवैध मोनोपॉली और अन्य 8 अनुभवी ठेकेदारों को ‘तकनीकी’ रूप से अयोग्य घोषित करने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। इस पूरे खेल के पीछे तीन मुख्य किरदारों के नाम प्रमुखता से उभरकर सामने आ रहे हैं, जो कथित तौर पर डीएफओ और सीसीएफ जैसे ईमानदार अधिकारियों की नाक के नीचे अपनी ‘सल्तनत’ चला रहे हैं।
मास्टरमाइंड की भूमिका में संतोष शुक्ला!
विभागीय गलियारों में चर्चा है कि इस पूरे टेंडर फिक्सिंग का ‘मास्टरमाइंड’ व्यय प्रभारी संतोष शुक्ला है। सूत्रों का दावा है कि फाइलों को किस तरह घुमाना है और किस नियम की आड़ में पसंदीदा ठेकेदार को फायदा पहुंचाना है, इसमें शुक्ला को महारत हासिल है। शिकायत पत्र के अनुसार, मेसर्स अखिलेश सिंह द्वारा निविदा की अनिवार्य शर्तों का उल्लंघन किया गया, जिसमें 200 रुपये के स्टाम्प की जगह महज 100 रुपये का स्टाम्प लगाया गया। इसके बावजूद संतोष शुक्ला की टेबल से फाइल का पास हो जाना सीधे तौर पर मिलीभगत की ओर इशारा करता है। वित्तीय अनियमितताओं और बाजार दर से ऊंचे रेट पर सामग्री की स्वीकृति दिलाने में व्यय प्रभारी की भूमिका सबसे संदिग्ध मानी जा रही है।
कंप्यूटर ऑपरेटर नितेश का ‘डिजिटल घेराव’
इस सिंडिकेट का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा है नितेश, जो मूलतः एक वनरक्षक है, लेकिन अपनी रसूख के दम पर फील्ड छोड़कर सालों से ऑफिस में कंप्यूटर ऑपरेटर बनकर जमा हुआ है। आरोप है कि नितेश ही वह व्यक्ति है जो ऑनलाइन पोर्टल पर अन्य ठेकेदारों के विरुद्ध ‘नकारात्मक रवैया’ अपनाता है। तकनीकी मूल्यांकन  के दौरान अन्य योग्य निविदाकारों को सूक्ष्म और आधारहीन कारणों से पोर्टल से बाहर करने का काम इसी स्तर पर होता है। एक वनरक्षक का ऑफिस में बैठकर टेंडर जैसी गोपनीय और महत्वपूर्ण प्रक्रिया को संचालित करना न केवल नियमों के विरुद्ध है, बल्कि यह दर्शाता है कि उसे ऊंचे स्तर से संरक्षण प्राप्त है।
क्रय समिति के मुखिया पर सवाल
किसी भी टेंडर को अंतिम मंजूरी देने वाली क्रय समिति का नेतृत्व हंसा सिंह भदोरिया  करते हैं। शिकायतकर्ताओं का सीधा आरोप है कि भदोरिया और ठेकेदार अखिलेश सिंह के बीच गहरे संबंध हैं। समिति के अध्यक्ष होने के नाते यह भदोरिया की जिम्मेदारी थी कि वे दस्तावेजों का सूक्ष्म परीक्षण करते, लेकिन उन्होंने ‘स्थापना पंजीयन’ जैसे अनिवार्य दस्तावेजों के अभाव के बावजूद एक ही फर्म को ‘पात्र’ घोषित कर दिया। यह ‘सिंगल टेंडर’ की स्थिति जानबूझकर निर्मित की गई ताकि प्रतिस्पर्धा शून्य हो जाए और सरकारी धन की बंदरबांट की जा सके।
4 साल की ‘अवैध मोनोपॉली’ और करोड़ों का नुकसान
पिछले 4 वर्षों के रिकॉर्ड का विश्लेषण करें तो स्पष्ट होता है कि उत्तर वन मंडल में टेंडर का आवंटन केवल एक ही पक्ष के इर्द-गिर्द घूम रहा है। सीमेंट, लोहा सरिया, ईंटा, रेत और प्रोफाइल शीट जैसी सामग्रियों की आपूर्ति में मेसर्स अखिलेश सिंह की अवैध मोनोपॉली स्थापित कर दी गई है। अन्य ठेकेदारों का कहना है कि जब प्रतिस्पर्धा खत्म कर दी जाती है, तो संबंधित फर्म बाजार दर से कहीं अधिक ऊंचे दाम कोट करती है। विभागीय समिति बिना किसी ‘मार्केट रेट एनालिसिस’ के इन दरों को स्वीकृति दे देती है, जिससे सरकारी खजाने को सीधे तौर पर करोड़ों रुपये की चपत लग रही है।
जांच की आंच: ईमानदार अधिकारियों से उम्मीद
हैरानी की बात यह है कि जहां एक ओर डीएफओ और सीसीएफ जैसे अधिकारियों की छवि बेदाग मानी जाती है, वहीं उनके अधीनस्थ यह त्रिमूर्ति संतोष शुक्ला, नितेश और हंसा सिंह भदोरिया पूरे विभाग की साख पर बट्टा लगा रहे हैं। अब पीड़ित ठेकेदारों ने लामबंद होकर शपथ पत्र देना शुरू कर दिया है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि 07 दिनों के भीतर इस एसआईटी  या ईओडब्ल्यू  से जांच नहीं कराई गई, तो वे माननीय लोकायुक्त और उच्च न्यायालय की शरण लेंगे।

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