वसूली कांड,आरोप, जांच, अधिकारों में कटौती और फिर शिकायत वापसी…आखिर सच क्या है सीएसपी पर लगे गंभीर आरोपों के बाद प्रशासनिक कार्रवाई, फिर शिकायतकर्ता का यू-टर्न; पूरे घटनाक्रम ने खड़े किए कई सवाल, अंतिम सच जांच से ही होगा स्पष्ट
वसूली कांड,आरोप, जांच, अधिकारों में कटौती और फिर शिकायत वापसी…आखिर सच क्या है
सीएसपी पर लगे गंभीर आरोपों के बाद प्रशासनिक कार्रवाई, फिर शिकायतकर्ता का यू-टर्न; पूरे घटनाक्रम ने खड़े किए कई सवाल, अंतिम सच जांच से ही होगा स्पष्ट
कटनी।। किसी भी जिले की पुलिस व्यवस्था केवल कानून लागू करने वाली संस्था नहीं होती, बल्कि जनता के विश्वास की सबसे बड़ी कसौटी भी होती है। ऐसे में जब पुलिस के एक जिम्मेदार अधिकारी पर अवैध वसूली जैसे गंभीर आरोप लगें, उसके बाद विभाग तत्काल कार्रवाई करे, चालक को निलंबित कर दे, अधिकार क्षेत्र में बड़ा बदलाव कर दे और फिर अचानक शिकायतकर्ता ही अपनी शिकायत वापस ले ले—तो स्वाभाविक रूप से यह पूरा घटनाक्रम चर्चा और सवालों के घेरे में आ जाता है।
पिछले कुछ दिनों में जो घटनाक्रम सामने आया, उसने न केवल पुलिस महकमे बल्कि पूरे शहर में बहस छेड़ दी है। आरोपों की गंभीरता, प्रशासनिक कार्रवाई की गति और उसके बाद शिकायत वापसी इन तीनों घटनाओं ने कई ऐसे प्रश्न खड़े कर दिए हैं, जिनके उत्तर केवल निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकते हैं।
क्या था पूरा मामला
21 जुलाई की रात ट्रांसपोर्ट व्यवसायी महेंद्र कुमार जैन ने आरोप लगाया कि लमतरा धर्मकांटा के पास उनकी हाईवा गाड़ी को रोककर नगर पुलिस अधीक्षक (सीएसपी) और उनके चालक ने चालक से अभद्रता की, मोबाइल और चाबी छीनी तथा कथित रूप से 30 हजार रुपये की मांग की। शिकायत में 25 हजार रुपये लेने और शेष 5 हजार रुपये बाद में देने का दबाव बनाए जाने का भी उल्लेख किया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक अभिनय विश्वकर्मा ने तत्काल चालक केशव सिंह को निलंबित कर दिया तथा जांच अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक कमल मौर्य को सौंप दी। प्रारंभिक स्तर पर यह कार्रवाई इस बात का संकेत मानी गई कि शिकायत को गंभीरता से लिया जा रहा है।

फिर आया प्रशासनिक फेरबदल
घटनाक्रम यहीं नहीं रुका। कुछ ही समय बाद पुलिस अधीक्षक ने नया कार्य विभाजन आदेश जारी किया। इसके तहत सीएसपी नेहा पच्चीसिया के अधिकार क्षेत्र से शहर के तीन प्रमुख थाना माधवनगर, रंगनाथ नगर और कुठला हटा दिए गए और उनका पर्यवेक्षण उप पुलिस अधीक्षक (अजाक) शिवा पाठक को सौंप दिया गया।
यद्यपि आदेश को प्रशासनिक पुनर्व्यवस्था बताया गया, लेकिन समय और परिस्थितियों को देखते हुए पुलिस महकमे में इसे वसूली प्रकरण से जोड़कर देखा जाने लगा। अब सीएसपी के पास केवल कोतवाली और महिला थाना का पर्यवेक्षण रह गया।

और फिर आया सबसे बड़ा मोड़ जिस शिकायत के आधार पर पूरा मामला खड़ा हुआ था, उसी शिकायतकर्ता ने कुछ ही दिनों बाद नया आवेदन देकर कहा कि उनके चालक ने उन्हें गलत जानकारी दी थी। उन्होंने अपनी पूर्व शिकायत को असत्य, भ्रामक और आधारहीन बताते हुए किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं करने का अनुरोध किया। शिकायत वापसी के इस आवेदन में यह भी उल्लेख किया गया कि यह निर्णय उन्होंने बिना किसी भय या दबाव के स्वेच्छा से लिया है। यहीं से यह पूरा मामला और अधिक चर्चाओं का विषय बन गया।

अब सबसे बड़े सवाल इस पूरे घटनाक्रम में अनेक ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर केवल विभागीय जांच और उपलब्ध साक्ष्यों से ही मिल सकता है। यदि मूल शिकायत पूरी तरह असत्य थी, तो इतनी गंभीर प्रशासनिक कार्रवाई क्यों हुई, यदि शिकायत में प्रथम दृष्टया दम नहीं था, तो चालक का तत्काल निलंबन किस आधार पर किया गया,यदि शिकायत सही थी, तो शिकायतकर्ता अचानक अपने बयान से क्यों पलट गए,शिकायत वापसी के बाद क्या जांच स्वतः समाप्त हो जानी चाहिए, जबकि विभाग स्वयं प्रारंभिक कार्रवाई कर चुका है, क्या प्रशासनिक फेरबदल केवल नियमित प्रक्रिया थी या घटनाक्रम से जुड़ा हुआ निर्णय,क्या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, कॉल डिटेल, लोकेशन और अन्य तथ्यों की जांच अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचेगी ,इन सभी प्रश्नों के उत्तर अभी उपलब्ध नहीं हैं।
दो संभावनाओं पर शहर में चर्चा
इस पूरे प्रकरण को लेकर शहर में दो तरह की चर्चाएं चल रही हैं। पहली चर्चा यह है कि यदि संबंधित अधिकारी अवैध गतिविधियों के विरुद्ध सख्ती से कार्रवाई कर रही थीं, तो क्या उन्हें बदनाम करने के उद्देश्य से झूठी शिकायत की गई।
दूसरी चर्चा यह है कि यदि शिकायत में तथ्य थे, तो फिर शिकायतकर्ता अचानक पीछे क्यों हट गया, क्या उसके पीछे कोई दबाव, समझाइश या समझौता था।
इन दोनों संभावनाओं की पुष्टि फिलहाल उपलब्ध तथ्यों से नहीं होती। इसलिए इनमें से किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। इनका उत्तर केवल निष्पक्ष जांच ही दे सकती है।
पुलिस की साख का भी सवाल
यह मामला अब केवल एक शिकायत या शिकायत वापसी तक सीमित नहीं रह गया है। यह पुलिस व्यवस्था की विश्वसनीयता से भी जुड़ गया है। यदि शिकायत झूठी थी, तो झूठी शिकायत करने वालों के विरुद्ध भी कानून के अनुसार कार्रवाई होना आवश्यक है, ताकि भविष्य में किसी ईमानदार अधिकारी की प्रतिष्ठा को नुकसान न पहुंचे। और यदि जांच में शिकायत के किसी भी हिस्से में तथ्य पाए जाते हैं, तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई भी उतनी ही आवश्यक होगी, ताकि जनता का विश्वास बना रहे। पुलिस अधीक्षक द्वारा अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को जांच सौंपी जा चुकी है। अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या शिकायत वापसी के बावजूद जांच अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचेगी या नहीं। यदि विभाग के पास स्वतंत्र साक्ष्य उपलब्ध हैं, तो जांच केवल शिकायतकर्ता के बयान पर निर्भर नहीं रहनी चाहिए। वहीं यदि जांच में शिकायत निराधार सिद्ध होती है, तो यह भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी अधिकारी पर गंभीर आरोप लगना असाधारण घटना होती है। उतना ही असाधारण होता है कुछ ही दिनों में उसी शिकायत का वापस ले लिया जाना। इसलिए इस पूरे प्रकरण में किसी भी पक्ष को दोषी या निर्दोष मान लेना जल्दबाजी होगी। जनता, पुलिस महकमा और प्रशासन सभी अब एक ही बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्यों के आधार पर पूरी हो तथा उसका निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से सामने आए। क्योंकि इस मामले में केवल एक अधिकारी या एक शिकायतकर्ता की विश्वसनीयता का प्रश्न नहीं है, बल्कि पूरे पुलिस तंत्र पर जनता के विश्वास का भी प्रश्न जुड़ा हुआ है।