सरकारी खजाने को चूना लगा रहा वन अमला; मरवाही वन मंडल की ऐंठी बीट में न तार-न फेंसिंग, रक्षकों की सुस्ती से सागौन सहित कीमती पेड़ों पर चली अंधाधुंध कुल्हाड़ी!

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मरवाही/जीपीएम।

पर्यावरण की सुरक्षा और जंगलों के संरक्षण के नाम पर जनता के टैक्स के करोड़ों रुपयों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। मरवाही वन मंडल अंतर्गत आने वाली ऐंठी बीट से सामने आई तस्वीरें और वीडियो केवल वन विभाग की लापरवाही की कहानी नहीं कहते, बल्कि सरकारी तंत्र की उस घोर सुस्ती और नाकामी की ओर इशारा करते हैं जिसने हरे-भरे जंगलों को पूरी तरह असुरक्षित छोड़ दिया है।

सागौन सहित अन्य कीमती और संरक्षित लकड़ियों की अंधाधुंध कटाई का यह बेहद गंभीर मामला है। यदि इस पर तत्काल उग्र और आक्रामक रुख नहीं अपनाया गया, तो मरवाही वन मंडल की यह हरी-भरी बीट रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगी।

जमीनी हकीकत: न खूंटा बचा, न तार; सब भगवान भरोसे!

वीडियो का गहराई से विश्लेषण करने पर सुरक्षा व्यवस्था के खोखले दावों की कलई पूरी तरह खुल जाती है। जिस पूरे एरिये को सुरक्षित करने के लिए कागजों पर लाखों रुपए की फेंसिंग दिखाई गई होगी, वहां जमीन पर सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है:

टूटे खूंटा और गायब बाड़: पूरे वन क्षेत्र में सुरक्षा के नाम पर एक भी खूंटा सलामत नहीं है, खूंटा पूरी तरह से टूटा हुआ है।

तारों का अता-पता नहीं: फेंसिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले कटीले तारों का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है, पूरी फेंसिंग ही गायब है।

अवैध घुसपैठ और चराई: सुरक्षा घेरा न होने के कारण यह पूरा आरक्षित क्षेत्र एक खुला मैदान बन चुका है। बेधड़क लोग जंगलों के भीतर घुस रहे हैं और अंधाधुंध तरीके से गाय-मवेशियों को चराया जा रहा है, जिससे छोटे पौधे पनपने से पहले ही नष्ट हो रहे हैं।

सागौन और अन्य कीमती लकड़ियों का कत्लेआम

सबसे ज्यादा विचलित करने वाली बात यह है कि इस सुरक्षाहीनता की आड़ में जंगल के भीतर सागौन के कई पेड़ों को बेरहमी से काटा गया है। वीडियो में साफ तौर पर कटे हुए पेड़ों के ठूंठ बिखरे दिखाई दे रहे हैं। स्थानीय सूत्रों की मानें तो मरवाही वन मंडल की इस ऐंठी बीट में सिर्फ सागौन ही नहीं, बल्कि अन्य प्रजातियों की कीमती लकड़ियों पर भी अवैध कटाई करने वाले हाथ साफ कर रहे हैं। जब दिन-दहाड़े पेड़ काटे जा रहे थे, तब वन विभाग का मैदानी अमला और गश्ती टीमें कहां सोई हुई थीं? क्या अधिकारियों को इस अंधाधुंध कटाई की भनक तक नहीं लगी, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?

बेघर हुए वन्यजीव, रिहायशी इलाकों में बढ़ रहा खतरा!

इस अंधाधुंध कटाई और उजड़ते जंगलों का सबसे भयानक और दर्दनाक असर बेजुबान वन्यजीवों पर पड़ रहा है। फेंसिंग न होने और पेड़ों के लगातार कटने से वन्यजीव आज पूरी तरह बेघर हो चुके हैं। उनका आशियाना छिन जाने के कारण वे मजबूरन भटककर ग्रामीण और रिहायशी इलाकों की तरफ रुख कर रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव द्वंद्व की स्थिति पैदा हो रही है। यदि यही आलम रहा तो इस क्षेत्र से कई महत्वपूर्ण वन्यजीवों की प्रजातियां हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएंगी। इस विनाशकारी स्थिति के लिए सीधे तौर पर वन विभाग की नाकामी जिम्मेदार है।

सिर्फ ऐंठी बीट नहीं, पूरे मरवाही वन मंडल में यही हाल!

चौंकाने वाली बात यह है कि यह बदहाली सिर्फ ऐंठी बीट तक सीमित नहीं है। विश्वस्त सूत्रों और मैदानी रिपोर्टों के अनुसार, पूरे मरवाही वन मंडल के विभिन्न क्षेत्रों में इसी प्रकार के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इलाके के कई वन क्षेत्रों में फेंसिंग के नाम पर भारी लापरवाही बरती जा रही है, जिससे सरकारी खजाने का पैसा पानी की तरह बह रहा है और जमीनी स्तर पर जंगल पूरी तरह असुरक्षित हो चुके हैं। मरवाही वन मंडल भर में कीमती पेड़ों की अवैध कटाई और जंगलों में मवेशियों को घुसाकर हरियाली को नष्ट करने का खेल धड़ल्ले से चल रहा है।

जनता के पैसे का खुला दुरुपयोग, कब जागेगा प्रशासन?

जंगलों की सुरक्षा, फेंसिंग और कटीले तारों के नाम पर खर्च होने वाला बजट जनता की गाढ़ी कमाई का हिस्सा है। इस पैसे का इस तरह दुरुपयोग और जंगलों की बर्बादी देखना देश के नागरिकों के साथ सीधा विश्वासघात है। वन विभाग की यह घोर लापरवाही अब बर्दाश्त के बाहर हो चुकी है।

हमारी सीधी मांग है कि:

इस गंभीर मामले को लेकर अब केवल सामान्य जांच के खोखले आश्वासनों से काम नहीं चलेगा।

इस बीट के जिम्मेदार वनरक्षकों और मरवाही वन मंडल के संबंधित बीट प्रभारियों पर तुरंत सख्त कार्रवाई कर उन्हें निलंबित किया जाए।

पेड़ों की अवैध कटाई में संलिप्त दोषियों के खिलाफ तत्काल सख्त कानूनी मामला दर्ज कर कार्रवाई की जाए।

जंगलों को मवेशियों, बाहरी घुसपैठ से बचाने और वन्यजीवों को सुरक्षित रखने के लिए प्रभावित क्षेत्रों में फेंसिंग और कटीले तारों की घेराबंदी का कार्य जल्द से जल्द युद्ध स्तर पर शुरू किया जाए।

मरवाही वन मंडल के प्रभावित वन क्षेत्रों की फेंसिंग और बजट खर्च की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच हो।

अगर अब भी प्रशासन ने आंखें नहीं खोलीं, तो जनता का यह आक्रोश सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होगा। जंगलों को उजाड़ने वाले और सरकारी पैसे का दुरुपयोग करने वाले ज़िम्मेदार अधिकारियों को जवाब देना ही होगा!

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