जब स्कूल जाने के लिए जान दांव पर लगानी पड़े, तब विकास के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है
जब स्कूल जाने के लिए जान दांव पर लगानी पड़े, तब विकास के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है
कटनी।। किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वहां बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं को कितनी प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन कटनी जिले की ढीमरखेड़ा तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत लालपुर के सगवा गांव की तस्वीर इस कसौटी पर हमें असहज कर देती है। बारिश के बीच उफनते नाले को पार कर स्कूल जाते मासूम बच्चों का वायरल वीडियो केवल एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जो विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ती खाई को उजागर करता है।
यह प्रश्न केवल सड़क का नहीं है, बल्कि उन मासूम जिंदगियों का है जिन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए रोज़ अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ रही है। संविधान ने बच्चों को शिक्षा का अधिकार दिया है, लेकिन जब स्कूल पहुंचने का रास्ता ही सुरक्षित न हो, तो यह अधिकार अधूरा प्रतीत होता है।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से सड़क निर्माण की मांग की जा रही है, लेकिन हर बार आश्वासन ही मिला। यदि यह सच है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि संवेदनशीलता की कमी का भी उदाहरण है। विकास योजनाओं की सफलता केवल फाइलों और बैठकों से नहीं, बल्कि गांव तक पहुंचने वाली सड़क, सुरक्षित पुलिया और नागरिकों की सुविधा से मापी जानी चाहिए।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि यदि किसी दिन कोई अप्रिय घटना घट जाती है, तो उसके बाद जांच, मुआवजा और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू होगी। लेकिन क्या प्रशासन की जिम्मेदारी केवल हादसे के बाद सक्रिय होने तक सीमित रहनी चाहिए सुशासन का अर्थ यही है कि संभावित खतरे को समय रहते समाप्त किया जाए।
यह भी सच है कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्राकृतिक परिस्थितियां कई बार विकास कार्यों को चुनौतीपूर्ण बना देती हैं। लेकिन वर्षों तक समाधान न निकल पाना स्वीकार्य नहीं कहा जा सकता। यदि स्थायी सड़क निर्माण संभव नहीं था, तो कम से कम अस्थायी सुरक्षित आवागमन, पुलिया, रस्सी पुल या अन्य वैकल्पिक व्यवस्था पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए था।
अब जबकि यह मामला सार्वजनिक चर्चा में है, जिला प्रशासन के सामने अवसर भी है और जिम्मेदारी भी। यदि कलेक्टर स्वयं मौके का निरीक्षण कर संबंधित विभागों से जवाब-तलब करें, समयबद्ध कार्ययोजना बनाएं और सड़क व सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था सुनिश्चित करें, तो यह केवल सगवा गांव ही नहीं बल्कि पूरे जिले के लिए सकारात्मक संदेश होगा।
समाज को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि विकास का वास्तविक अर्थ शहरों की चमक नहीं, बल्कि गांव के उस बच्चे की सुरक्षित मुस्कान है जो बिना डर के स्कूल पहुंच सके।
आज आवश्यकता आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि त्वरित और संवेदनशील कार्रवाई की है। क्योंकि किसी भी सरकार की सबसे बड़ी सफलता तब मानी जाएगी, जब किसी मासूम को शिक्षा पाने के लिए उफनते नाले में अपनी जान दांव पर न लगानी पड़े।