शहडोल आते ही जागी सीएमओ की ‘चेतना’, जयसिंहनगर में रीती रही गागर, यहाँ भरने लगे सागर!
शहडोल। भोपाल से 2 जून को आदेश जारी होते ही जयसिंहनगर छोड़कर नए सीएमओ निशांत सिंह ठाकुर ने 24 घंटे के भीतर 360 डिग्री का टर्न लिया और 3 जून बुधवार सुबह शहडोल में ज्वाइनिंग दे दी। ज्वाइन करते ही वे अध्यक्ष घनश्याम जायसवाल और पार्षदों की पूरी फौज लेकर सीधे फिल्टर प्लांट पहुंच गए। महीनों से प्यासी जनता की सुध अचानक नए साहब के आते ही आ गई और त्वरित कार्रवाई के फोटोयुक्त प्रेस नोट भी सोशल मीडिया पर तैरने लगे।तबादले के चंद घंटों के भीतर जिस तरह नए सीएमओ साहब ने कार्यभार संभाला, वह उनकी प्रशासनिक मुस्तैदी से ज्यादा शहडोल की मलाईदार कुर्सी के प्रति उनके ‘असीम प्रेम’ को दिखाता है। शायद शहडोल के नाम में ही वह सियासी जादू है जिसने साहब के सुस्त पड़े सिस्टम के अंदर अचानक चमत्कारी ऊर्जा का संचार कर दिया। बड़ा सवाल यह है कि यही सीएमओ साहब जब जयसिंहनगर में तैनात थे, तब वहां भी पानी की भयंकर किल्लत को लेकर कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के पार्षद और स्थानीय जनता लगातार चीख-पुकार मचा रही थी। लेकिन वहां साहब को कभी फील्ड में धूप सेकते नहीं देखा गया, मानो वहां की जनता का कंठ सूखा था तो सूखा रहे, साहब को तो बस शहडोल आकर ही गंगा बहानी थी।
इस पूरी प्रशासनिक फुर्ती के पीछे असल मंशा जल संकट दूर करना कम और नगर के ठेकेदारों तथा रसूखदारों को यह कड़ा संदेश देना ज्यादा है कि अब ‘कुर्सी’ का असली मालिक बदल चुका है। नए सीएमओ के आते ही सिर्फ प्रशासनिक अमला ही नहीं, बल्कि नगर पालिका अध्यक्ष भी अचानक सुपर-मैन वाले एक्टिव मोड में नजर आने लगे हैं। नगर में यह चर्चा अब चौराहों पर जोरों पर है कि अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और पार्षदों की पूरी टोली बीते दिनों भोपाल के चक्कर शहर की प्यास बुझाने के लिए नहीं, बल्कि पुराने सीएमओ की कुर्सी खिसकाने के लिए काट रही थी।
रणनीति शायद बहुत गहरी थी समस्या हल न हो, जनता त्राहि-त्राहि करे और ठीकरा पुराने सीएमओ के सिर फोड़कर उनकी विदाई का टिकट पक्का करा दिया जाए। देर से ही सही, लेकिन नए सीएमओ के रूप में अपना ‘पसंदीदा’ हमसफर पाकर अध्यक्ष जी इतने ज्यादा ऊर्जावान हो गए हैं कि वे साहब को लेकर शहर के ‘घाट-घाट’ के चक्कर कटवा रहे हैं। जनप्रतिनिधि और सभापति आशुतोष यादव भी इस नए ‘जल-उत्सव’ की तस्वीरें सोशल मीडिया पर चमकाने में पूरी मुस्तैदी से जुटे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि साहब के अंदर शहडोल आते ही जो यह ‘दिव्य ऊर्जा’ प्रगट हुई है, वह सच में जनता के सूखे कंठों तक पानी पहुंचाती है या यह भी सिर्फ कुर्सी बदलने की एक और सियासी रस्म है।