औद्योगिक शुचिता पर कथित ‘कागजी सिंडिकेट’ का आघात
शहडोल।एशिया के औद्योगिक मानचित्र पर अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाली ओरिएंट पेपर मिल अमलाई इन दिनों अपने विनिर्माण कौशल के कारण नहीं, बल्कि प्रबंधन और ठेकेदारी व्यवस्था के मध्य उपजे एक कथित वित्तीय अंतर्विरोध के कारण चर्चा के केंद्र में है। उद्योग जगत के गलियारों में यह विमर्श तीव्र हो गया है कि मिल का आंतरिक तंत्र आर्थिक विसंगतियों के एक चक्रव्यूह में उलझ चुका है। इस कथित घटनाक्रम ने न केवल मिल की साख को प्रभावित किया है, बल्कि कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न अंकित कर दिए हैं।कागज कारखाने में क्या हो रहा है?
ओपीएम अमलाई के भीतर वर्तमान में जो कुछ घटित हो रहा है, वह किसी औद्योगिक रहस्य से कम नहीं है। प्रत्यक्षदर्शियों और सूत्रों की मानें तो कारखाने के भीतर ‘कुछ तो बहुत बड़ी गड़बड़’ चल रही है, जिसने मिल की साख को दांव पर लगा दिया है। निर्माण की आड़ में कागजों पर जो जादुई खेल खेला जा रहा है, उसने मिल की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। कच्चे माल की आवक से लेकर भुगतान की फाइलों तक, हर स्तर पर विसंगतियों का एक ऐसा कुहासा छाया है जिसे देखकर यह साफ है कि मिल के भीतर नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए एक समानांतर व्यवस्था संचालित की जा रही है।
ठेकेदारों के इस एकाधिकार का रहस्य क्या है?
आखिर ऐसी क्या विवशता या कौतुक है कि विगत कई दशकों से कुछ गिने-चुने रसूखदार ठेकेदारों का ही इस प्रतिष्ठित मिल पर पूर्ण एकाधिकार स्थापित है? यह यक्ष प्रश्न आज अमलाई के हर जागरूक नागरिक की जिह्वा पर है। क्या यह कोई जादुई सम्मोहन है या फिर मिल के भीतर बैठे आकाओं के साथ संलिप्तता का कोई शाश्वत अनुबंध? नए और योग्य सेवा प्रदाताओं को दरकिनार कर केवल एक ही सिंडिकेट को दशकों तक उपकृत करते रहना यह सिद्ध करता है कि मिल के भीतर योग्यता और पारदर्शिता की हत्या कर केवल ‘मैनेजमेंट फिक्सिंग’ के खेल को ही प्रश्रय दिया जा रहा है।
शीर्ष प्रबंधन की आंखों पर यह कैसा पर्दा है?
इस पूरे महाघोटाले का सबसे विस्मयकारी और पीड़ादायक पहलू यह है कि इस भ्रष्टाचार की गूंज कभी प्रबंधन के सर्वोच्च मुखिया तक नहीं पहुंचती। आखिर ऐसा कौन सा सुरक्षा कवच या आंतरिक चक्रव्यूह तैयार किया गया है, जो नीचे चल रहे अरबों के खेल की भनक भी उच्च अधिकारियों तक पहुंचने नहीं देता? ऐसा प्रतीत होता है कि बीच के रसूखदार अधिकारियों और सफेदपोशों की टोली ने शीर्ष प्रबंधन के इर्द-गिर्द सूचनाओं का एक ऐसा ‘ब्लाइंड स्पॉट’ निर्मित कर दिया है, जिससे सच को उन तक पहुंचने से पहले ही गला घोंटकर दफन कर दिया जाता है।
यार्ड की रहस्यमयी गतिशीलता का सच
इस संपूर्ण प्रकरण का सबसे विस्मयकारी पक्ष बांस एवं लकड़ी यार्ड की वह कथित ‘गतिशीलता’ है, जहां सामान्यतः अनलोडिंग, छंटाई और गुणवत्ता परीक्षण में घंटों का समय लगता है। वहां भारी वाहनों का मात्र 30 से 45 मिनट की अल्पावधि में प्रविष्ट होकर भारमुक्त हो जाना, तार्किक रूप से संशय उत्पन्न करता है। चर्चा है कि यह सब किसी आधुनिक यांत्रिक या रोबोटिक चमत्कार के कारण नहीं, अपितु कच्चे माल के अनुभाग प्रमुख की छत्रछाया में कागजों पर ‘ओके’ की सील लगाने वाले एक सुनियोजित और भ्रष्ट खेल का सीधा परिणाम है।
कांटा घर बना भ्रष्टाचार का नियंत्रण कक्ष
सूत्रों के अनुसार, मिल का कांटाघर इस कथित सिंडिकेट का वैचारिक नियंत्रण कक्ष बन चुका था। आशंका व्यक्त की जा रही है कि डिजिटल सॉफ्टवेयर के साथ कतिपय तकनीकी छेड़छाड़ कर वाहनों की वास्तविक भौतिक उपस्थिति के बिना ही उनका भार दर्ज कर लिया गया। एक मास में 90 फेरों का जो असंभव कीर्तिमान स्थापित किया गया, वह बिना सुरक्षा विभाग और कांटा घर के प्रभारियों की मिलीभगत के मुमकिन ही नहीं था। कागजों पर गाड़ियां दौड़ती रहीं और मिल के कोष से करोड़ों रुपये का भुगतान होता रहा।
राजकोष पर डाका और कृषकों का शोषण
इस विसंगति का सीधा और घातक प्रभाव स्थानीय निर्धन कृषकों और सरकारी कोष पर पड़ा है। कृषकों के नाम पर आवंटित होने वाले लाभांश को यह सिंडिकेट स्वयं डकार गया, जिससे वास्तविक अन्नदाता आज भी रिक्त हाथ रहने को विवश है। इसके अतिरिक्त, इस बोगस इनवॉइसिंग के माध्यम से वस्तु एवं सेवा कर की एक विशाल राशि की चोरी कर राजकोष को अपूरणीय क्षति पहुंचाई गई है। यह केवल एक मिल का अंदरूनी घाटा नहीं, बल्कि सरकार को करोड़ों का चूना लगाने वाला एक संगठित और गंभीर आर्थिक अपराध है।