बुढार की प्यास पर माफिया का पहरा, ‘जीवन’ ही बन रहा ‘काल’

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शहडोल। जिले के बुढार क्षेत्र में एक ऐसी साजिश रची जा रही है, जो आने वाले समय में हजारों लोगों को पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसा सकती है। जरवाही से होकर गुजरने वाली विशालकाय सोन नदी, जो पूरे बुढार की जीवनरेखा है और जिससे पूरे शहर की प्यास बुझती है, आज संगठित भ्रष्टाचार और खनिज माफिया की भेंट चढ़ रही है। यहाँ प्रकृति के साथ केवल खिलवाड़ नहीं हो रहा, बल्कि आम जनता के हक पर डकैती डाली जा रही है।
​रक्षक ही बना भक्षक: रात होते ही बिक जाता है ‘जीवन’
​हैरतअंगेज खुलासा हुआ है कि बांध की सुरक्षा के लिए तैनात कर्मचारी, जिसका नाम विडंबनापूर्ण रूप से “जीवन” है, वही बुढार की जनता के जीवन से खिलवाड़ कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक, यह कर्मचारी रेत माफियाओं के साथ मिलकर प्रतिदिन रात के अंधेरे में बांध के गेट खोल देता है। चंद रुपयों की लालच में बहाया गया यह पानी सीधे तौर पर जलस्तर को नीचे गिरा देता है, जिससे माफिया का काम आसान हो जाता है।
​चाँद की रोशनी में ‘सफेद सोने’ की लूट
​जैसे ही गेट खुलने से नदी का जलस्तर कम होता है, माफिया का सिंडिकेट सक्रिय हो जाता है। रात के सन्नाटे और चाँद की मद्धिम रोशनी में सैकड़ों मजदूर नदी की छाती चीरने के लिए उतार दिए जाते हैं। देखते ही देखते मेटाडोर और बड़ी गाड़ियां रेत से भर दी जाती हैं। यह कोई छिटपुट चोरी नहीं, बल्कि एक संगठित आपराधिक गिरोह द्वारा चलाया जा रहा ‘सिंडिकेट’ है, जिसकी जड़ें बहुत गहरी हैं।
​दारू-मुर्गा और नोटों की गड्डियां: पुलिस की भूमिका पर सवाल
​क्षेत्र में चर्चा आम है कि इस काले खेल को सत्ता और रसूख का पूरा संरक्षण प्राप्त है। आरोप है कि “यादव बंधु” इस पूरे सिंडिकेट को ऑपरेट कर रहे हैं। सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि कानून के रखवाले ही अपराधियों के हमप्याला बने हुए हैं। माफियाओं के अड्डों पर पुलिस की मौजूदगी में ‘दारू-मुर्गा’ की पार्टियां और नोटों का लेनदेन खुलेआम हो रहा है। जब रक्षक ही भक्षकों के साथ दावत उड़ाएंगे, तो नदी और जनता की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है।
​मंडरा रहा है जल संकट
​यदि यह लूट इसी तरह जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब सोन नदी पूरी तरह सूख जाएगी और बुढार शहर में पानी का हाहाकार मच जाएगा। संगठित गिरोह जिस तरह से पैर पसार रहे हैं, वह न केवल पर्यावरण के लिए बल्कि जिले की कानून व्यवस्था के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। क्या जिला प्रशासन और खनिज विभाग की नींद तब खुलेगी जब शहर प्यास से तड़पेगा, या समय रहते इन ‘मगरमच्छों’ पर नकेल कसी जाएगी?

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